Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी: देवदासी प्रथा के खिलाफ जंग और देश की पहली महिला सर्जन की प्रेरणादायक कहानी

डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी भारत की उन महान महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने अपने साहस और संघर्ष से समाज में बदलाव की नींव रखी.

जब भारत में महिलाओं की जिंदगी कई सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई थी, तब एक ऐसी महिला ने जन्म लिया जिसने न सिर्फ इन बंदिशों को चुनौती दी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई राह भी बनाई. डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी का नाम भारत के उन महान समाज सुधारकों में शामिल है, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला अधिकारों के क्षेत्र में ऐतिहासिक काम किया.

30 जुलाई 1886 को जन्मीं मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी अपने दौर की पहली महिला चिकित्सकों में से एक थीं. वह ब्रिटिश भारत में विधायक बनने वाली पहली महिलाओं में भी शामिल रहीं. उनका पूरा जीवन संघर्ष, साहस और बदलाव की कहानी है. दक्षिण भारत की इस महान हस्ती को देशभर में सम्मान मिला. सरोजिनी नायडु और एनी बेसेंट जैसी दिग्गज महिलाओं ने भी उनके काम की सराहना की. साल 1956 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया.

समाज की सोच से लड़कर बनाई अपनी पहचान

मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां सामाजिक परंपराओं की गहरी छाया थी. उनकी मां चन्द्राम्मल देवदासी परंपरा से जुड़ी थीं और समाज उन्हें सम्मान की नजर से नहीं देखता था. लेकिन उनके पिता नारायणस्वामी अय्यर ने उस समय की रूढ़ियों को तोड़ते हुए चन्द्राम्मल को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया.

बचपन से ही मुत्तुलक्ष्मी ने भेदभाव और सामाजिक असमानताओं को करीब से देखा. शायद यही वजह थी कि उन्होंने जीवनभर कमजोर और वंचित लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई. उन्होंने भी समाज की परवाह किए बिना तेलुगु भाषी डॉक्टर सुंदर रेड्डी से विवाह किया.

शिक्षा के क्षेत्र में रचा इतिहास

उस समय लड़कियों की उच्च शिक्षा को लेकर समाज में कई तरह की पाबंदियां थीं. ऐसे दौर में मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी ने पुरुषों के लिए बने पुदुकोट्टई के महाराजा कॉलेज में दाखिला लेकर इतिहास रच दिया. वह इस कॉलेज की पहली महिला छात्रा बनीं.

उनके प्रवेश को लेकर काफी विरोध हुआ, लेकिन पुदुकोट्टई के महाराजा मार्तंड भैरव तोंडमान के समर्थन से उन्हें पढ़ाई जारी रखने का मौका मिला. वह कॉलेज में अकेली महिला छात्रा थीं, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.

मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी ने अपने जीवन में कई ऐसे मुकाम हासिल किए जो उस समय किसी कल्पना से कम नहीं थे. वह भारत की पहली महिला डॉक्टरों और सर्जनों में शामिल थीं. साल 1926 में उन्होंने मद्रास राज्य विधान परिषद की सदस्य बनकर इतिहास बनाया और बाद में इसकी उपाध्यक्ष भी बनीं. वह मद्रास नगर पालिका की पहली महिला पार्षद भी रहीं.

उन्होंने महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कई मुद्दों पर काम किया. उस समय प्रचलित एक अमानवीय प्रथा, जिसमें ऊंची जाति की कुछ महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान कराने के लिए दलित महिलाओं पर निर्भर रहती थीं, उसके खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई.

देवदासी प्रथा के खिलाफ मजबूत अभियान

महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के लिए उनका सबसे बड़ा संघर्ष देवदासी प्रथा के खिलाफ था. उनका मानना था कि किसी भी लड़की को धार्मिक परंपरा के नाम पर शोषण का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए.

1929 में लिखे एक पत्र में उन्होंने साफ कहा था कि उनका लक्ष्य लड़कियों को इस प्रथा से मुक्त कराना और इसे पूरी तरह खत्म करना है. उनके लगातार प्रयासों का ही परिणाम था कि देवदासी प्रथा के उन्मूलन की दिशा में कानून बनाने की राह तैयार हुई.

कैंसर इलाज की दिशा में बड़ा योगदान

मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी केवल सामाजिक सुधारक ही नहीं थीं, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भी उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा. उन्होंने भारत में कैंसर उपचार की जरूरत को बहुत पहले समझ लिया था. उनके प्रयासों से चेन्नई के अडयार में कैंसर अस्पताल की स्थापना हुई, जो आगे चलकर देश के प्रमुख कैंसर संस्थानों में शामिल हुआ.

राजनीति को बनाया बदलाव का माध्यम

विधायक के रूप में उन्होंने महिलाओं के लिए कई सुधारों की लड़ाई लड़ी. बहुविवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई. उन्होंने मुस्लिम छात्राओं के लिए छात्रावास बनवाने की पहल की और महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाने तथा शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयास किए.

उनकी सोच सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी. विदेशों में भी भारतीय महिलाओं की प्रगति और अधिकारों की चर्चा उनके काम के कारण पहुंची.

मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी एक मजबूत राष्ट्रवादी विचारों वाली महिला थीं. जब महात्मा गांधी को दांडी मार्च के दौरान ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया, तो उन्होंने विरोध में मद्रास विधान परिषद की सदस्यता छोड़ दी. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सुधार, दोनों क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभाई.

डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी का जीवन आज भी यह संदेश देता है कि बदलाव लाने के लिए साहस, शिक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति जरूरी है. उन्होंने उस समय महिलाओं के लिए रास्ते खोले, जब उनके लिए आगे बढ़ना बेहद कठिन था. उनकी कहानी भारतीय इतिहास में महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायक मिसाल बनी हुई है.

ये भी पढ़ें- ‘पप्पू-राहुल को मारो जूता…’ संसद में राम मंदिर चढ़ावे चोरी पर ड्रामा, भड़के अयोध्या के संत

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital