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16 अगस्त 1781 भारतीय इतिहास की उन महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है, जब काशी (बनारस) में महाराज चेत सिंह और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष हुआ। इसे बनारस विद्रोह या चेत सिंह का विद्रोह भी कहा जाता है। यह घटना 1857 के महान विद्रोह से लगभग 76 वर्ष पहले हुई थी और उत्तर भारत में अंग्रेजी प्रभुत्व के खिलाफ प्रारंभिक संगठित प्रतिरोध का एक उदाहरण बनी।
महाराज चेत सिंह (चैत सिंह) काशी नरेश महाराज बलवंत सिंह के पुत्र थे। 1770 में पिता की मृत्यु के बाद वे काशी राज्य की गद्दी पर बैठे। बक्सर के युद्ध (1764) के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव बढ़ रहा था। 1775 की संधि के अंतर्गत अवध के नवाब से काशी की जमींदारी कंपनी के अधीन आ गई। चेत सिंह को वार्षिक निश्चित कर (खिराज) देना पड़ता था।
दूसरे आंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान कंपनी को धन और सैनिकों की आवश्यकता पड़ी। गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह से अतिरिक्त अनुदान (लगभग 5 लाख रुपये) और घुड़सवार सेना की माँग की। राजा ने शुरू में कुछ भुगतान किया, लेकिन बाद में देरी या असमर्थता जताई। हेस्टिंग्स ने इसे अवज्ञा माना और जुर्माना थोपने तथा राजा को सबक सिखाने का निश्चय किया।
16 अगस्त 1781 की घटना
14 अगस्त 1781 को वारेन हेस्टिंग्स काशी पहुंचे। 16 अगस्त को उन्होंने राजा चेत सिंह को उनके शिवाला घाट स्थित महल में नजरबंद करने का आदेश दिया। रेजीडेंट मार्कहम दो कंपनियों सिपाहियों के साथ राजा को बंदी बनाने पहुंचे। सिपाहियों के पास पर्याप्त गोला-बारूद नहीं था।
इस अपमान की खबर फैलते ही काशी की जनता और राजा के सैनिकों में आक्रोश फूट पड़ा। रामनगर से आए सैनिकों सहित बड़ी संख्या में लोग महल के आसपास जमा हो गए। उन्होंने अंग्रेजी सिपाहियों पर हमला बोल दिया। भीषण संघर्ष में लगभग 200 अंग्रेजी सिपाही और अधिकारी (जिनमें लेफ्टिनेंट स्टॉकर, स्कॉट और साइम्स शामिल थे) मारे गए या घायल हुए।
उथल-पुथल में महाराज चेत सिंह गंगा के किनारे से पगड़ियों की रस्सी बनाकर नाव में बैठकर नदी पार कर रामनगर किले पहुँच गए। वारेन हेस्टिंग्स स्वयं खतरे में पड़ गए और चुनार किले की ओर भाग निकले। इस घटना से जुड़ी लोकप्रिय कहावत आज भी प्रचलित है —
“घोड़े पे हौदा, हाथी पे जीन, ऐसे भागा वारेन हेस्टिंग्स।”
विद्रोह का विस्तार और अंत
चेत सिंह ने स्थानीय शासकों से सहायता मांगी, लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। विद्रोह अवध के कुछ क्षेत्रों तक फैला। मेजर पोफम के नेतृत्व में कंपनी की सेना ने जल्दी ही संगठित होकर जवाबी कार्रवाई की। लतीफपुर, बिजैगढ़ और अन्य स्थानों पर लड़ाइयों के बाद चेत सिंह की सेनाएँ पराजित हुईं।
अंततः चेत सिंह ग्वालियर चले गए, जहाँ उन्होंने 1810 तक निवास किया। काशी राज्य जब्त कर लिया गया और चेत सिंह के भांजे (बहन के पुत्र) महीप नारायण सिंह को गद्दी पर बैठाया गया। कंपनी ने कर बढ़ा दिया और प्रशासन पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।
महत्व
यह विद्रोह पूरी तरह सफल नहीं हुआ, लेकिन इसने अंग्रेजी अधिकारियों को यह संदेश दिया कि भारतीय नरेश और जनता आसानी से अधीन नहीं होगी। काशी जैसे पवित्र और महत्वपूर्ण नगर में जनता का व्यापक समर्थन उल्लेखनीय था। इतिहासकारों के अनुसार यह उत्तर भारत में ब्रिटिश विस्तार के खिलाफ शुरुआती संगठित प्रतिरोधों में से एक था।
आज भी शिवाला घाट और चेत सिंह किले के आसपास इस घटना की याद दिलाने वाले शिलालेख मौजूद हैं। महाराज चेत सिंह का यह संघर्ष काशी की स्वाभिमानी परंपरा और अंग्रेजी दमन के खिलाफ लोक-प्रतिरोध की गाथा के रूप में याद किया जाता है।
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