Hindi Literature: भारतीय भक्ति धारा और हिंदी साहित्य के इतिहास में पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. 30 सितंबर 1837 को पंजाब के फिल्लौर में जन्मे श्रद्धाराम फिल्लौरी ने मात्र 33 वर्ष की आयु में ऐसी आरती की रचना की, जो आज दुनिया भर के हिंदू घरों में गूंजती है. धर्म की आस्था को लोकभाषा से जोड़ने वाले पंडित फिल्लौरी बहुभाषाविद, लेखक और समाज सुधारक भी थे.
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी भारतीय संस्कृति और हिंदी गद्य साहित्य के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं. उन्होंने ‘ओम जय जगदीश हरे’ जैसी अमर आरती की रचना करके आस्था को जन-जन की भाषा से जोड़ा. साहित्य के क्षेत्र में उनके उपन्यास ‘भाग्यवती’ को हिंदी गद्य के शुरुआती मील के पत्थरों में गिना जाता है. धार्मिक सौहार्द, समाज सुधार और साहित्य सृजन के माध्यम से उन्होंने जो योगदान दिया, वह आज भी प्रासंगिक है.
आरंभिक जीवन और शिक्षा का विस्तार
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी का जन्म 30 सितंबर 1837 को पंजाब के जालंधर जिले के फिल्लौर कस्बे में हुआ था. उनके पिता जयदयालु ज्योतिष के विद्वान थे. धार्मिक वातावरण में पले-बढ़े श्रद्धाराम ने बाल्यकाल में ही गुरुमुखी सीख ली थी. इसके बाद उन्होंने संस्कृत, हिंदी, फारसी, उर्दू और ज्योतिष का गहन अध्ययन किया. उन्होंने अपनी जन्मभूमि फिल्लौर को अपने नाम का अभिन्न हिस्सा बना लिया और 24 जून 1881 को लाहौर में अंतिम सांस ली.
‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती का इतिहास
वर्ष 1870 में पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने अमर आरती ‘ओम जय जगदीश हरे’ की रचना की. उस समय उनकी आयु लगभग 33 वर्ष थी. शोध बताते हैं कि ‘जय जगदीश हरे’ पदबंध का ऐतिहासिक संबंध कवि जयदेव के ‘गीतगोविंद’ के श्री दशावतार स्तोत्र से जुड़ता है. राजस्थान के देवस्थान विभाग के दस्तावेज भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस कालजयी आरती की रचना 1870 में फिल्लौर में ही हुई थी.
हिंदी साहित्य और उपन्यासों में योगदान
पंडित फिल्लौरी ने धार्मिक रचनाओं के साथ-साथ गद्य साहित्य को भी समृद्ध किया. उनकी प्रमुख कृतियों में सिखां दे राज दी विथ्या, पंजाबी बातचीत, धर्म कसौटी, सत्य धर्म मुक्तावली, सत्यामृत प्रवाह और भाग्यवती शामिल हैं. लंबे समय तक लाला श्रीनिवास दास के परीक्षा गुरु को हिंदी का पहला उपन्यास माना जाता रहा, लेकिन आधुनिक शोधों में कई विद्वान पंडित फिल्लौरी के उपन्यास भाग्यवती को हिंदी का पहला उपन्यास स्वीकार करते हैं.
सामाजिक ताना-बाना और विवाह
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी का व्यक्तित्व रूढ़िवादिता से परे था. उनका विवाह मेहताब कौर नामक सिख महिला से हुआ था. यह प्रसंग तत्कालीन पंजाब के सामाजिक ताने-बाने, धार्मिक सौहार्द और सांस्कृतिक विविधता का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है.
यह भी पढ़ें-पाइप बिछाने से आगे की कहानी: कैसे स्वतंत्र देव सिंह ने बुंदेलखंड में पानी की किल्लत को दी चुनौती?
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



