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द्रविड़ राजनीति की गहराई समझाती ‘पेरियार से जयललिता तक’

अभी देश की नजरें तमिलनाडु पर टिकी हैं. विधानसभा चुनाव में डीएमके-एआईएडीएमके की द्रविड़ पार्टियां फिर से अपनी पहचान, भाषा और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर मोर्चा संभाले हुए हैं, जबकि नई ताकतें जैसे अभिनेता विजय की टीवीके और भाजपा की कोशिशें द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक गढ़ को चुनौती दे रही हैं.

अभी देश की नजरें तमिलनाडु पर टिकी हैं. विधानसभा चुनाव में डीएमके-एआईएडीएमके की द्रविड़ पार्टियां फिर से अपनी पहचान, भाषा और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर मोर्चा संभाले हुए हैं, जबकि नई ताकतें जैसे अभिनेता विजय की टीवीके और भाजपा की कोशिशें द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक गढ़ को चुनौती दे रही हैं. ठीक इसी वक्त प्रवीण कुमार झा की नई किताब ‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ (राजकमल प्रकाशन, 224 पृष्ठ) यह सिर्फ इतिहास की किताब नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति को समझने का एक जीवंत, संवादात्मक दस्तावेज है जो उत्तर-दक्षिण के बीच की खाई को भी समझने में मदद करता है.

नॉर्वे में पेशे से चिकित्सक प्रवीण झा जिन्होंने ‘कुली लाइन्स’, ‘खुशहाली का पंचनामा’ और ‘वाह उस्ताद’ जैसी बहुचर्चित किताबें लिखी हैं. जिनकी खासियत यह है कि जटिल विषयों को भी बोलचाल की भाषा और संवादधर्मी शैली में पेश करते हैं. ‘द्रविड़ राजनीति’ में भी यही सलीका दिखता है. किताब तथ्यों से भरी है, लेकिन पढ़ते वक्त लगता है कोई दोस्त बैठकर समझा रहा है, “देखो भाई, ये नस्ली विभाजन की कहानी कैसे राजनीति बन गई.”

द्रविड़ आंदोलन की शुरुआती पृष्ठभूमि

किताब की शुरुआत ही अनोखी है. लेखक कहते हैं – दुनिया में शायद ही कोई जन-समूह हो जिसकी आनुवंशिकी मिश्रित न हो. भारत में खानाबदोश, सैन्य और व्यापारिक आवागमन से रक्त और भाषा दोनों का मेल हुआ. फिर भी 19वीं सदी में ‘आर्य-द्रविड़’ नस्लों का विभाजन राजनीतिक हथियार बन गया. थियोसोफिकल सोसायटी को पूर्व-बिंदु मानते हुए झा कांग्रेस के गठन, दक्षिण भारत में गांधीजी के हिंदी प्रचार और उसी दौर में पेरियार (ई.वी. रामास्वामी) के उदय को द्रविड़ आंदोलन की पहली निर्णायक घटना बताते हैं.

जब कांग्रेस ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ का नारा दे रही थी, तब पेरियार ने ‘आर्यो, बाहर जाओ’ कहा और 1946 में ‘द्रविड़ कड़गम’ का झंडा उठाया. फिर अन्नादुरै ने पेरियार से अलग होकर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की नींव रखी. किताब स्वतंत्रता-पूर्व की इन पेचीदा गलियों से गुजरते हुए आधुनिक द्रविड़ राजनीति तक पहुंचती है – एम.जी.आर. की सिनेमा-राजनीति, करुणानिधि का सामाजिक न्याय का एजेंडा, जयललिता का करिश्माई नेतृत्व, तमिल ईलम का मुद्दा और राजीव गांधी की हत्या तक. अंत में उत्तर-दक्षिण ध्रुवीकरण की पड़ताल भी है.

झा का मकसद स्पष्ट है – विरोध न रहे, भाषाओं का द्वंद्व न हो, श्रेष्ठ और हीन का झगड़ा न हो. वे द्रविड़ आंदोलन की जड़ों (ब्राह्मण-विरोध, आत्म-सम्मान, सामाजिक समानता) को समझाते हुए भी उसे राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में देखते हैं. आज जब तमिलनाडु में द्रविड़ पहचान फिर से ‘आर्य-द्रविड़ युद्ध’ के रूप में चर्चा में है और राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय अस्मिता को चुनौती दे रही हैं, तब यह किताब पाठक को बिना पक्षपात के ऐतिहासिक संदर्भ देती है.

किताब की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषा है. हिंदी में दक्षिण की राजनीति अक्सर ‘दूर की कहानी’ लगती है – नाम मुश्किल, संदर्भ अनजान. झा ने इसे ‘निजी विषय’ बना दिया है. कोई व्याख्यान नहीं, संवाद है. तथ्य इतने घने हैं कि सामान्य पाठक भी हर पृष्ठ पर कुछ नया सीख लेगा, फिर भी बोझ नहीं लगेगा.

‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ उन सभी के लिए उपयोगी है जो तमिलनाडु के चुनावी माहौल को सिर्फ सतही खबरों से नहीं, बल्कि जड़ों से समझना चाहते हैं. यह बताती है कि द्रविड़ राजनीति सिर्फ तमिलनाडु की नहीं, बल्कि भारतीय संघीय ढांचे की भी कहानी है – जहां क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय एकता का संतुलन हमेशा चुनौती बना रहता है.

पहचान और एकता पर गहरी पड़ताल

अगर आपको तमिल राजनीति में दिलचस्पी है, तो यह किताब छोड़िए मत. 224 पृष्ठों की यात्रा आपको पेरियार के ‘आर्यो, बाहर जाओ’ से जयललिता के युग तक ले जाएगी – और अंत में एक सवाल छोड़ जाएगी : क्या उत्तर और दक्षिण अब भी ‘हम’ और ‘वे’ रहेंगे, या एक-दूसरे को समझकर आगे बढ़ सकते हैं?

प्रवीण झा ने हिंदी पाठकों को द्रविड़ राजनीति का एक ऐसा आईना दिया है जो न सिर्फ दिखाता है, बल्कि सोचने पर मजबूर भी करता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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