टाटा समूह एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि नेतृत्व, भरोसे और संस्थागत मूल्यों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. समूह की आगे की दिशा क्या होगी, नेतृत्व में बदलाव किस तरह होगा और टाटा ट्रस्ट्स तथा कारोबारी प्रबंधन के बीच तालमेल कैसे बना रहेगा. इन सवालों के बीच हरीश भट की 2025 में आई किताब “डूइंग द राइट थिंग: लर्निंग्स फ्रॉम रतन टाटा” को याद करना काफी प्रासंगिक लगता है.
यह किताब रतन टाटा की पारंपरिक जीवनी नहीं है. इसमें उनके जीवन और कामकाज से जुड़ी ऐसी घटनाओं और फैसलों को सामने रखा गया है, जिनसे समझ आता है कि उनके लिए कारोबार सिर्फ मुनाफा कमाने का जरिया नहीं था. कई मौकों पर उन्होंने आसान या तुरंत फायदा देने वाले रास्ते के बजाय उस फैसले को चुना, जिसे वे सही मानते थे.
हरीश भट टाटा समूह के साथ करीब चार दशक तक जुड़े रहे हैं और ब्रांड कस्टोडियन जैसे अहम पदों पर काम कर चुके हैं. अपनी किताब में वे रतन टाटा के नेतृत्व की एक खास बात पर जोर देते हैं कि मुश्किल परिस्थिति में भी अपने मूल्यों से समझौता ना करना.
टाटा इंडिका इसका एक अच्छा उदाहरण है. जब भारत में अपनी यात्री कार बनाने की योजना को लेकर कई तरह की शंकाएं थीं, तब रतन टाटा ने इसे केवल कारोबारी परियोजना की तरह नहीं देखा. उनके लिए यह भारतीय उद्योग की क्षमता को साबित करने की कोशिश भी थी.
इसी तरह उनका एक जाना-पहचाना सिद्धांत था “A promise is a promise.” यानी वादा किया है तो उसे निभाना है. यह सोच कर्मचारियों से लेकर कारोबारी साझेदारों और समाज के प्रति जिम्मेदारी तक दिखाई देती थी.
कई मौकों पर कारोबारी फायदे और नैतिक मूल्यों के बीच टकराव भी आया. ऐसे समय में रतन टाटा का झुकाव उस रास्ते की ओर रहा, जिसे वे सही समझते थे, भले उससे तत्काल आर्थिक लाभ कम हो.
संकट के समय असली नेतृत्व सामने आता है
किसी कारोबारी नेता की पहचान सिर्फ अच्छे समय में नहीं होती. मुश्किल दौर में उसका व्यवहार कहीं ज्यादा मायने रखता है. 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद ताज होटल के कर्मचारियों और प्रभावित लोगों के प्रति रतन टाटा का रवैया इसका उदाहरण माना जाता है.
इसी तरह टाटा फाइनेंस से जुड़े संकट के दौरान भी कर्मचारियों के साथ खड़े रहने और लोगों की गरिमा को महत्व देने की बात सामने आती है. भट की किताब में ऐसे प्रसंग यह बताते हैं कि किसी संगठन के लिए इंसान सिर्फ एक कर्मचारी या आंकड़ा नहीं होता.
विनिवेश और पुनर्गठन जैसे कठिन कारोबारी फैसलों में भी सम्मान और निष्पक्षता को महत्व देना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा. यही वजह है कि किताब में ‘सही काम’ का अर्थ केवल कानूनी रूप से सही फैसला लेना नहीं रह जाता. इसमें नैतिकता, संवेदनशीलता और लंबे समय की सोच भी शामिल हो जाती है.
आज के टाटा समूह से इसका क्या संबंध है?
अगस्त 2026 में टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के भविष्य को लेकर सामने आई चर्चा ने एक बार फिर समूह के नेतृत्व और उत्तराधिकार को सुर्खियों में ला दिया है. चंद्रशेखरन ने 2017 में टाटा समूह की कमान संभाली थी. उनके कार्यकाल में समूह के कारोबार और बाजार मूल्य में उल्लेखनीय विस्तार हुआ.
लेकिन इसी दौर में एयर इंडिया समेत कुछ कारोबारों में चुनौतियां, कुछ अनलिस्टेड कंपनियों के प्रदर्शन और समूह की आगे की रणनीति को लेकर भी सवाल उठे हैं. टाटा ट्रस्ट्स और प्रबंधन के बीच रिश्तों को लेकर सार्वजनिक चर्चा ने इस पूरी स्थिति को और दिलचस्प बना दिया है.
ऐसे समय में रतन टाटा की नेतृत्व शैली को समझना महज अतीत को याद करना नहीं है. यह इस बात पर विचार करने का मौका भी है कि इतने बड़े और विविध कारोबारी समूह को आगे ले जाने के लिए किन मूल्यों की जरूरत होगी.
ट्रस्ट्स और मैनेजमेंट के बीच संतुलन सबसे अहम
टाटा समूह की सबसे खास बात उसकी स्वामित्व संरचना है. टाटा ट्रस्ट्स की समूह में बड़ी हिस्सेदारी है और लंबे समय से यह विचार सामने रहा है कि कारोबारी सफलता का अंतिम उद्देश्य समाज के व्यापक हित से जुड़ा होना चाहिए.
रतन टाटा के दौर में ‘ट्रस्टीशिप’ की यही भावना समूह की पहचान का हिस्सा बनी रही. इसका मतलब यह नहीं कि कारोबार में मुनाफा जरूरी नहीं है. बल्कि सवाल यह है कि मुनाफे के साथ जिम्मेदारी और भरोसे को कैसे कायम रखा जाए.
आज नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के बीच यही संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है. ट्रस्ट्स और पेशेवर प्रबंधन, दोनों की भूमिका अलग हो सकती है, लेकिन समूह के दीर्घकालिक हित के लिए दोनों के बीच स्पष्टता, संवाद और भरोसा जरूरी है.
टाटा की विरासत सिर्फ कंपनियों की कहानी नहीं
टाटा नाम को सिर्फ कार, स्टील, आईटी या एयरलाइन से जोड़कर देखना इस विरासत को छोटा कर देना होगा. भारतीय उद्योग के विकास में टाटा समूह की भूमिका कारोबार से कहीं आगे रही है.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से लेकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च जैसी संस्थाओं तक, समूह से जुड़े परोपकारी और संस्थागत प्रयासों ने देश में शिक्षा, विज्ञान और शोध को भी प्रभावित किया है.
आज इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और एयर इंडिया जैसे नए क्षेत्रों में समूह का विस्तार हो रहा है. इन पहलों के सामने कारोबारी चुनौतियां अपनी जगह हैं, लेकिन इनके जरिए टाटा समूह एक बार फिर बदलती भारतीय अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका तय करने की कोशिश कर रहा है.
युवा पीढ़ी के लिए भी है बड़ी सीख
रतन टाटा का निधन अक्टूबर 2024 में हुआ, लेकिन उनकी सार्वजनिक छवि और नेतृत्व से जुड़ी सीख आज भी चर्चा में है. हरीश भट की किताब की खासियत यह है कि वह बड़े-बड़े सिद्धांतों के बजाय घटनाओं और कहानियों के जरिए इन बातों को समझाने की कोशिश करती है.
आज जब सफलता को अक्सर शेयर बाजार की कीमत, कंपनी के मुनाफे या तेजी से बढ़ते वैल्यूएशन से मापा जाता है, तब यह सवाल पूछना जरूरी है कि किसी संस्था की असली सफलता आखिर होती क्या है.
क्या वह केवल ज्यादा पैसा कमाना है? या फिर ऐसा संगठन बनाना भी है जिस पर कर्मचारी, ग्राहक, निवेशक और समाज लंबे समय तक भरोसा कर सकें?
रतन टाटा की सोच को समझें तो जवाब काफी हद तक दूसरा नजर आता है.
आगे का रास्ता क्या होगा?
टाटा समूह के सामने आने वाले समय में कई बड़े फैसले हैं. नेतृत्व का सवाल, अलग-अलग कारोबारों की रणनीति, एयर इंडिया जैसे बड़े निवेशों से जुड़ी चुनौतियां और ट्रस्ट्स तथा प्रबंधन के बीच तालमेल इन सबका असर समूह की अगली दिशा पर पड़ेगा. इन सवालों के जवाब केवल बोर्डरूम में लिए जाने वाले कारोबारी फैसलों से नहीं मिलेंगे. इसके लिए उस भरोसे को भी बनाए रखना होगा, जो टाटा नाम के साथ दशकों में जुड़ा है.
यही वह जगह है जहां “डूइंग द राइट थिंग” की सीख महत्वपूर्ण हो जाती है. रतन टाटा की विरासत का सबसे बड़ा हिस्सा शायद यही है कि कठिन समय में भी सही फैसले लेने की हिम्मत रखी जाए, भले उसका फायदा तुरंत दिखाई नहीं दे.
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-भारत एक्सप्रेस
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