UPSC @ 100: AI IMAGE
1 अक्टूबर 1926 को भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत पब्लिक सर्विस कमीशन के रूप में स्थापित संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने 1 अक्टूबर 2026 को अपना शताब्दी वर्ष पूरा किया. यह संस्थान न केवल भारत की सिविल सेवाओं का संरक्षक है, बल्कि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ भी बन चुका है. दिल्ली के शाहजहां रोड स्थित धोलपुर हाउस में स्थित इसका मुख्यालय आज भी उसी भव्यता के साथ खड़ा है, जहां से देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारियों का चयन होता है.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
UPSC की जड़ें ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में खोजी जा सकती हैं.1600 के दशक में कंपनी ने व्यापारिक कर्मचारियों की भर्ती शुरू की थी. प्लासी (1757) और बक्सर (1764) की लड़ाई के बाद कंपनी का चरित्र बदल गया और शासन के लिए योग्य अधिकारियों की आवश्यकता बढ़ी. 1854 की मैकाले समिति ने आधुनिक नौकरशाही की नींव रखी. 1855 में ब्रिटेन में सिविल सर्विस कमीशन अस्तित्व में आया और 1858 तक इसका अधिकार क्षेत्र भारतीय सिविल सेवा (ICS) तक बढ़ा दिया गया.
प्रारंभ में भर्ती सीधे लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के माध्यम से होती थी. प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 में स्टाफ सिलेक्शन बोर्ड (SSB) बनाया गया. 1922 तक भारतीय उम्मीदवारों के लिए कमीशन में प्रवेश सीमित था. 1924 में ली कमीशन की सिफारिश पर देश में एक सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना हुई. 1926 में जिम्मेदारी इस आयोग को सौंप दी गई. सर रॉस बार्कर इसके पहले अध्यक्ष बने (1926-1932).
1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन (FPSC) का गठन हुआ, जो 1 अप्रैल 1937 से प्रभावी हुआ. सर डेविड पेट्री इसके पहले अध्यक्ष बने. स्वतंत्रता के समय (15 अगस्त 1947) एच.के. कृपालानी अध्यक्ष थे. संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) के साथ FPSC का नाम बदलकर UPSC कर दिया गया और ICS को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का नाम मिला.
संवैधानिक स्थिति और भूमिका
संविधान के अनुच्छेद 320 के तहत UPSC एक संवैधानिक निकाय है. इसका मुख्य कार्य संघ और राज्यों की सेवाओं के लिए परीक्षाओं का संचालन करना है. आज UPSC मुख्य रूप से लिखित परीक्षा (प्रारंभिक और मुख्य) तथा साक्षात्कार (व्यक्तित्व परीक्षण) के माध्यम से भर्ती करता है. 2022-23 में इसने 15 भर्ती परीक्षाएं आयोजित कीं- 11 सिविल सेवाओं और 4 रक्षा सेवाओं के लिए. लगभग 33.51 लाख आवेदन प्राप्त हुए, फिर भी परीक्षा शुल्क कई राज्य लोक सेवा आयोगों की तुलना में कम है.
धौलपुर हाउस की कहानी
1952 में UPSC का मुख्यालय धोलपुर हाउस में स्थानांतरित हुआ. यह भवन पहले धोलपुर के राजा उदय भान सिंह का था. स्वतंत्रता के बाद राज्य का विलय होने पर इसे सरकार को सौंप दिया गया. राजा को राजप्रमुख नियुक्त किया गया. यह भवन आज भी UPSC की पहचान बना हुआ है.
सुधार और चुनौतियां
स्वतंत्रता के बाद कई सुधार समितियों- मोरारजी देसाई, के. हनुमंथैया, एल.टी. जनरल एस.पी.पी. थोरात, कोठारी, सतीश चंद्र, वाई.के. अलग, पी.सी. होता और अरुण निगावेकर- ने परीक्षा पैटर्न को आकार दिया. सूचना का अधिकार (RTI) के बावजूद UPSC ने लंबे समय तक परीक्षाओं से संबंधित जानकारी साझा करने में संयम बरता.
आज, शताब्दी वर्ष में भी, UPSC और राज्य लोक सेवा आयोग विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पूजा खेडकर जैसे मामलों ने परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं. फिर भी, सिविल सर्विस परीक्षा (CSE) देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा बनी हुई है, जिसमें प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख उम्मीदवार सीसैट (CSAT) के लिए आवेदन करते हैं.
शताब्दी का महत्व
UPSC ने भारत को एक पेशेवर, निष्पक्ष और मेरिट-आधारित प्रशासनिक ढांचा दिया है. ICS से IAS, IPS और भारतीय वन सेवा तक की यह यात्रा उपनिवेशवाद से लोकतंत्र की ओर संक्रमण का प्रतीक है. आज जब आयोग अपना 100वां वर्ष मना रहा है, तो चुनौतियां नई हैं- पारदर्शिता, परीक्षा सुधार, और युवाओं का विश्वास बनाए रखना. लेकिन इसकी नींव मजबूत है. धोलपुर हाउस की दीवारें गवाह हैं कि कैसे एक संस्था ने देश की सेवा के लिए पीढ़ियों को तैयार किया.
UPSC @ 100- यह सिर्फ एक संस्थान की कहानी नहीं, बल्कि भारत की प्रशासनिक यात्रा का जीवंत इतिहास है.
यह भी पढ़ें:अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस: जब भोजपुरी के सुरों ने अंग्रेजी की दुनिया में बांधा समां
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



