भारत के स्वतंत्रता संग्राम में वासुदेव बलवंत फड़के (Vasudev Balwant Phadke) का नाम सुनते ही राष्ट्रभक्ति की ज्वाला भभक हो उठती है. उन्हें आदि क्रांतिकारी या भारतीय सशस्त्र विद्रोह के जनक (Father of Indian Armed Rebellion) कहा जाता है. 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महाक्रांति की असफलता के बाद जब देश में निराशा छा गई थी, तब वासुदेव ने ही आजादी की चिंगारी को फिर से भड़काया. उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संगठित विद्रोह की नींव रखी, जो बाद के क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी.
वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म 4 नवंबर 1845 को महाराष्ट्र के रायगड जिले के शिरढोण गांव में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके दादा अनंतराव कर्नाला किले के अंतिम कमांडर थे, जो 1818 में अंग्रेजों के हाथों मारे गए थे. बचपन से ही वासुदेव में बहादुरी और स्वतंत्रता की भावना कूट-कूटकर भरी थी. उन्होंने कल्याण और पुणे में शिक्षा प्राप्त की और 1862 में बॉम्बे यूनिवर्सिटी के शुरुआती स्नातकों में शामिल हुए.
वे पुणे के मिलिट्री फाइनेंस ऑफिस में क्लर्क की नौकरी करने लगे, लेकिन ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियां, किसानों की दयनीय स्थिति और 1875-76 के दंगे उन्हें गहरे तक प्रभावित करते रहे. 1870 में न्यायमूर्ति एम.जी. रानाडे के भाषण ने उन्हें स्वदेशी और स्वराज की ओर प्रेरित किया.
मां की मृत्यु और क्रांति का संकल्प
एक बार जब उनकी मां गंभीर रूप से बीमार हुईं, तो उन्होंने अवकाश मांगा, लेकिन ब्रिटिश अधिकारी ने अपमानजनक तरीके से इनकार कर दिया. गांव पहुंचते-पहुंचते मां का देहांत हो चुका था. इस घटना ने उनके हृदय को विदीर्ण कर दिया. उन्होंने ब्रिटिश शासन को भारत की दुर्दशा का मूल कारण माना और नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. उन्होंने कहा था कि परतंत्रता में जीना मृत्यु से बदतर है.
पहली क्रांतिकारी सेना
वासुदेव ने क्रांतिकारी संगठन बनाकर रामोशी, कोली, भील और धनगर जैसी जनजातियों के युवकों को संगठित किया. 1879 में उन्होंने भारत की पहली क्रांतिकारी सेना (लगभग 200-300 सशस्त्र योद्धा) का गठन किया. यह सेना महाराष्ट्र के कई जिलों में फैली और ब्रिटिश खजानों पर हमले कर किसानों की मदद करती थी.
13 मई 1879 को उन्होंने विश्राम बाग में ब्रिटिश अधिकारियों की बैठक पर हमला किया, कई अफसरों को मार गिराया और भवन को आग लगा दी. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 50,000 रुपये का इनाम घोषित किया. बदले में वासुदेव ने मुंबई में पोस्टर लगवाए कि रिचर्ड जैसे अफसर का सिर लाने वाले को 75,000 रुपये मिलेंगे.
गिरफ्तारी, मुकदमा और अदम्य साहस
20 जुलाई 1879 को कालादगी में एक मंदिर में छिपे हुए वासुदेव को धोखे से पकड़ लिया गया. पुणे में मुकदमा चला, जहां उन्होंने अदालत में कहा:
“भारतवासी आज मृत्यु के मुहाने पर खड़े हैं. परतंत्रता की इस लज्जापूर्ण स्थिति से मर जाना ही श्रेयस्कर है. मैं भगवान या सरकार से नहीं डरता, क्योंकि मैंने कोई पाप नहीं किया. दधीचि की तरह यदि मैं अपने जीवन का बलिदान देकर भारत की गुलामी की पीड़ा को थोड़ा भी कम कर सका, तो खुद को धन्य समझूंगा.”
31 अगस्त 1879 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और अदन (यमन) की जेल भेज दिया गया.
अंतिम बलिदान
अदन जेल में भी वासुदेव ने हार नहीं मानी. 13 फरवरी 1883 को उन्होंने जेल की दरवाजा कब्जे से उतारकर भागने की कोशिश की और 17 मील तक दौड़ते रहे, लेकिन पकड़े गए. कठोर यातनाओं के बावजूद उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की. अंततः 17 फरवरी 1883 को मात्र 37 वर्ष की आयु में अदन जेल में उन्होंने प्राण त्याग दिए. उनकी मृत्यु पर न्यायमूर्ति रानाडे ने कहा: “वासुदेव बलवंत फड़के ने देश की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया.”
शस्त्र क्रांति का जनक
वासुदेव ने 1857 की लौ को बुझने नहीं दिया. उन्होंने गांव-गांव जाकर स्वराज का मंत्र दिया, पहली सशस्त्र सेना बनाई और साबित किया कि गुलामी सहन नहीं की जा सकती. उनके प्रयासों ने बाद के क्रांतिकारियों जैसे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि को प्रेरित किया. वे वास्तव में अंग्रेजों के खिलाफ शस्त्र क्रांति के जनक थे.
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-भारत एक्सप्रेस
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