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“चेरनोबिल 1986: जब एक धमाके ने पूरे शहर को बना दिया ‘भूतिया ज़ोन’- दुनिया की सबसे खतरनाक परमाणु त्रासदी, जिसका खौफ आज भी जिंदा है”

Nuclear Accident History: 26 अप्रैल 1986 की रात हुआ चेरनोबिल न्यूक्लियर हादसा मानव इतिहास की सबसे खतरनाक परमाणु दुर्घटनाओं में से एक है, जिसने पूरी दुनिया को परमाणु ऊर्जा के खतरों से आगाह किया.

Chernobyl Nuclear Disaster
Edited by Shubhra Rai

Chernobyl Nuclear Disaster: चेरनोबिल हादसा 1986 में हुआ एक विनाशकारी परमाणु दुर्घटना थी, जिसने हजारों लोगों को प्रभावित किया और दुनिया को परमाणु सुरक्षा के महत्व का एहसास कराया.

दुनिया की सबसे बड़ी मानव-निर्मित परमाणु आपदा

26 अप्रैल 1986 की रात, तत्कालीन सोवियत संघ (अब Ukraine) में स्थित चेरनोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट में एक भयावह दुर्घटना हुई. यह हादसा आज भी दुनिया की सबसे बड़ी मानव-निर्मित परमाणु आपदा माना जाता है, जिसने वैश्विक स्तर पर परमाणु सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए.

चेरनोबिल प्लांट यूक्रेन की राजधानी कीव (Kyiv) से लगभग 130 किलोमीटर उत्तर में प्रिप्यात (Pripyat) शहर के पास स्थित था. उस समय यूक्रेन सोवियत संघ का हिस्सा था. हादसे के दौरान प्लांट के यूनिट-4 रिएक्टर में एक रूटीन सेफ्टी टेस्ट चल रहा था, लेकिन ऑपरेटर की गलतियों और RBMK रिएक्टर डिजाइन की खामियों के कारण स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई.

रात 1:23 बजे दो भीषण विस्फोट हुए. पहला विस्फोट स्टीम और अत्यधिक गर्म फ्यूल के कारण हुआ, जबकि दूसरा हाइड्रोजन गैस के कारण. इन विस्फोटों ने रिएक्टर की छत उड़ा दी और ग्रेफाइट मॉडरेटर में आग लग गई, जिससे भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में फैल गए.

तत्काल प्रभाव

इस दुर्घटना में 2 प्लांट वर्कर्स की मौके पर ही मौत हो गई. इसके बाद आने वाले कुछ हफ्तों में 28 फायरफाइटर्स और इमरजेंसी वर्कर्स की मौत एक्यूट रेडिएशन सिंड्रोम (ARS) के कारण हुई. इस तरह शुरुआती मौतों की संख्या लगभग 30-31 मानी जाती है.

लंबे समय के प्रभाव

रेडियोएक्टिव फॉलआउट का असर मुख्य रूप से यूक्रेन, बेलारूस और रूस में देखा गया. हजारों लोग रेडिएशन से प्रभावित हुए. बच्चों और किशोरों में थायरॉइड कैंसर के लगभग 6,000 मामले सामने आए, जिनमें से 15 लोगों की मौत हुई, जिसका मुख्य कारण आयोडीन-131 था.

संयुक्त राष्ट्र के “चेरनोबिल फोरम” के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित लगभग 6 लाख लोगों में 4,000 तक अतिरिक्त कैंसर से मौतों की आशंका जताई गई है. कुछ अन्य अध्ययनों में यह आंकड़ा 9,000 तक बताया गया है.

चेरनोबिल हादसे ने हिरोशिमा परमाणु बमबारी (Hiroshima atomic bombing) से लगभग 400 गुना ज्यादा रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में छोड़े. हालांकि, अंतर यह था कि हिरोशिमा में विस्फोट हवा में हुआ था, जबकि चेरनोबिल का रिएक्टर जमीन के स्तर पर फटा, जिससे रेडिएशन लंबे समय तक फैलता रहा.

करीब 50 लाख लोग प्रभावित क्षेत्रों में रहते थे, हालांकि अधिकांश को कम मात्रा में रेडिएशन मिला. वहीं, लगभग 6 लाख ‘लिक्विडेटर्स’ (सफाई कर्मी) ने इस आपदा के बाद सफाई कार्य में हिस्सा लिया, जिनमें से कई को भारी रेडिएशन का सामना करना पड़ा. प्रिपयत शहर को पूरी तरह खाली करा लिया गया और आज भी चेरनोबिल एक्सक्लूजन जोन काफी हद तक निर्जन बना हुआ है. यह हादसा दुनिया के टॉप-5 इंडस्ट्रियल डिजास्टर में शामिल है.

सबक क्या मिला?

चेरनोबिल हादसे ने परमाणु सुरक्षा की अहमियत को दुनिया के सामने उजागर किया. इस दुर्घटना के पीछे मुख्य कारण सुरक्षा मानकों की कमी, ऑपरेटर ट्रेनिंग की कमी और रिएक्टर डिजाइन की खामियां थीं. इसके बाद कई देशों ने अपने परमाणु प्लांट्स के सुरक्षा मानकों को और सख्त किया.

आज भी चेरनोबिल साइट पर सफाई और सुरक्षा कवर (न्यू सेफ कन्फाइनमेंट) का काम जारी है. यह हादसा हमें याद दिलाता है कि परमाणु ऊर्जा जितनी शक्तिशाली है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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