Donald Trump vs China: अमेरिका के सियासी गलियारों में इन दिनों ऐसा हाई-प्रोफाइल ड्रामा चल रहा है. इसने वैश्विक कूटनीति से लेकर घरेलू राजनीति तक भूचाल ला दिया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर उसी आक्रामक और तीखे मिजाज में लौट आए हैं, जिसके लिए वे जाने जाते हैं. इस बार उनके निशाने पर कोई स्थानीय प्रतिद्वंदी नहीं, बल्कि सीधे बीजिंग की कम्युनिस्ट सत्ता यानी ‘ड्रैगन’ है. ट्रंप ने चीन पर अमेरिकी लोकतंत्र की रीढ़ पर हमला करने का सबसे सनसनीखेज आरोप जड़ दिया है. वहीं न्यूयार्क टाइम्स (NYT) ने उनके दावों की पोल खोल असल सच्चाई पर बात की है.
डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि चीन ने उनके खिलाफ इतिहास की सबसे बड़ी साइबर डिजिटल साजिश रची. दूसरी तरफ प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने राष्ट्रपति के इन दावों के पीछे छिपी ‘अहंकार’ और ‘डीप स्टेट’ की थ्योरी का एक्स-रे कर दिया है. आइये जानें आखिर क्या है ट्रेन के इन बयानों का असल कारण?
व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम से देश को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुफिया दस्तावेजों के हवाले से दावा किया कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) ने अमेरिकी चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी डेटा सेंधमारी को अंजाम दिया है. ट्रंप के मुताबिक, चीन ने 18 राज्यों के 220 मिलियन (22 करोड़) अमेरिकी मतदाताओं का संवेदनशील डेटा चुराया, खरीदा या हैक किया. इस डेटा में नागरिकों के नाम, पते, फोन नंबर और उनकी राजनीतिक पार्टियों की पसंद जैसी गुप्त जानकारियां शामिल थीं.
खुफिया इनपुट का हवाला देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि चीनी सरकार ने ट्रंप को दोबारा जीतने से रोकने के लिए और उनके पहले प्रशासन को कमजोर करने के लिए बकायदा एक ‘स्पेशल डेटा मिसयूज यूनिट’ बनाई थी, जिसने 2018 के मध्यावधि चुनाव से लेकर 2020 के राष्ट्रपति चुनाव तक जी-जान लगा दी थी.
डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर केवल डेटा चोरी का ही नहीं, बल्कि अमेरिका के भीतर एक प्रोपेगैंडा टूल चलाने का भी गंभीर आरोप लगाया है. उन्होंने दावा किया कि चीनी अधिकारियों ने अमेरिका की बड़ी कंपनियों के साथ अपने व्यापारिक संपर्कों का इस्तेमाल किया ताकि अमेरिकी बिजनेस दिग्गजों को राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ खड़ा किया जा सके और घरेलू अर्थव्यवस्था पर से भरोसा कम किया जा सके.
राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि चीनी खुफिया तंत्र ने ऐसे अमेरिकी पत्रकारों की सूची तैयार की थी जो राष्ट्रपति के बारे में नकारात्मक खबरें लिखते थे. चीन ने उन्हें डोनाल्ड ट्रंप की छवि बिगाड़ने और उनके खिलाफ ज्यादा से ज्यादा जहरीले लेख लिखने के लिए भारी-भरकम रकम (रिश्वत) देने की पेशकश की थी.
जैसे ही डोनाल्ड ट्रंप का यह प्राइम-टाइम भाषण खत्म हुआ, न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक खोजी रिपोर्ट ने इस पूरे दावे की हवा निकाल दी. एनवाईटी ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रपति के दावों की पोल खोलते हुए कई चौंकाने वाले फैक्ट्स सामने रखे हैं.
लेख के मुताबिक, हाल ही में सार्वजनिक किए गए सरकारी दस्तावेज इस बात का कतई समर्थन नहीं करते कि चीन ने 2020 के कैंपेन के नतीजों को असल में बदल दिया था या कोई धांधली हुई थी. ट्रंप ने चुनाव प्रणाली की कमियों को बहुत ज्यादा सनसनीखेज बनाकर पेश किया है.
विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप का यह भाषण इस पतझड़ में होने वाले 2026 के मध्यावधि चुनाव की जमीन तैयार करना है. वे पहले से ही माहौल बना रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी हारी, तो वह चुनाव भी ईमानदार नहीं होगा.
फेडरल इलेक्शन कमीशन के पूर्व रिपब्लिकन चेयरमैन ट्रेवर पॉटर ने ट्रंप की तुलना प्रसिद्ध उपन्यास ‘मोबी डिक’ के जुनूनी चरित्र कैप्टन अहाब से की है, जो अपनी हार को कभी स्वीकार नहीं कर सकता. 18 महीनों से ट्रंप उन अधिकारियों को हटा रहे हैं जिन्होंने उनकी हार की जांच की थी और अपने करीबियों के लिए यह लिटमस टेस्ट बना दिया है कि वे जोसेफ आर. बाइडेन जूनियर की जीत को झूठ मानें.
भले ही मंच से ‘चीन’ को विलेन बनाया जा रहा हो, लेकिन इस पूरी कवायद का असली मकसद डोनाल्ड ट्रंप के उस आहत अहंकार को शांत करना है. वह संवैधानिक रूप से यह मानने को तैयार ही नहीं है कि वह कभी कोई चुनाव हार भी सकते हैं.
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चीन द्वारा 22 करोड़ वोटर्स का डेटा चुराने की बात कहकर ट्रंप ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं. पहला, उन्होंने चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाकर अपनी राष्ट्रवादी छवि चमकाई है. दूसरा, अपनी पुरानी चुनावी हार का ठीकरा ‘डीप स्टेट’ और चीन की गुप्त कूटनीति पर फोड़ दिया है.
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