Iran US Conflict: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष का आज 12वां दिन है. इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल और गैस की किल्लत देखी जा रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिलहाल इस संघर्ष को खत्म करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं. वहीं ईरान एक स्टेप आगे बढ़ते हुए स्टेट ऑफ होर्मूज को बंद कर दिया है. इस इलाके से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल निकलता है. जिससे विश्व की लाइफलाइन चलती है. कई एक्सपर्ट यह दावा कर रहे हैं कि इस संघर्ष के पीछे इजरायल है. इसका समर्थन ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी की है. उनका कहना है कि इजरायल ने ट्रंप को गुमराह कर ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया. दूसरी तरफ कई एक्सपर्ट्स अलग मत दे रहे हैं. उनका मानना है कि यह लड़ाई ईरान से नहीं बल्कि अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन से लड़ी जा रही है. जिससे अमेरिका भी खौफ खा रहा है. यह दुश्मन कोई और नहीं बल्कि चीन है.
बताया जा रहा है कि ट्रंप मिडिल ईस्ट में चीन के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए ही ईरान पर हमले करने को मंजूरी दी है. आखिर सवाल ये उठता है कि मिडिल ईस्ट में चीन इतना कैसे ताकतवर हो गया है कि ट्रंप को ईरान पर हमला करना पड़ गया.
जो महाशक्तियों के बीच पिस रहा मिडिल ईस्ट
मिडिल ईस्ट में जियोपॉलिटिक्स अलग तरह से काम करती है. यहां कुछ देश अमेरिकी पक्ष में हैं तो कुछ रूस और चीन के पक्ष में. वहीं यहां कई छोटे-छोटे प्यादे भी हैं, जो एक डमी स्टेट के तौर पर दबाव बनाने के लिए काम आते हैं. जिसमें हिजबुल्लाह, हमास और हूती शामिल हैं.
मिडिल ईस्ट में एक पक्ष अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. जिसमें इजरायल, सऊदी अरब और ईरान हैं, तो वहीं उनके प्यादे इनकी बिछाई बिसात पर चाल चल रहे हैं. वहीं दूसरा पक्ष है चीन और अमेरिका.
हाल के सालों में ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को बायपास करने के लिए अपनी पूरी अर्थव्यवस्था चीन के हाथों में दे दी है. इसके बदले चीन ईरान में बंदरगाह, सड़कें और बाकि इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहा है. साथ ही चीन ईरान से लगातार तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को जिंदा किये हुए है. आज ईरान का 90 प्रतिशत तेल चीन ही खरीदता है. यहां तक चीन ने ईरान में रणनीतिक घुसपैठ करते हुए उसे अपना एक फॉर्वर्ड बेस तक तैयार कर दिया है. इसके बदौलत चीन ने ईरान को घातक हथियारों और मिसाइल टेक्नोलॉजी दी. जो अमेरिकी सेना को घातक नुकसान पहुंचाने का माद्दा रखते हैं.
आखिर ट्रंप क्यों खौफ में हैं?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका मिडिल ईस्ट में एक प्रोटेक्टर की भूमिका में है. जिसका प्रभाव मिडिल ईस्ट की राजनीति और जियोपॉलिटिक्स पर जबरदस्त पड़ता है. इस इलाके से दुनिया में सबसे ज्यादा तेल निकलता है. इसलिए अमेरिका इसपर अपनी पकड़ बनाए रखता है. अब ईरान में चीन की मौजूदगी उसके लिए खतरे की घंटी की तरह है.
इसके अलावा चीन ईरान के जस्क बंदरगाह पर एक स्थाई नौसैनिक अड्डा बनाने वाला था. इसके बनते ही चीन की पहुंच सीधे उस क्षेत्र में हो जाती जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल निकलता है. यह अमेरिका के लिए किसी हमले से कम नहीं था. ईरान में चीन की मौजूदगी सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरे नाटो और मिडिल ईस्ट के लिए कांटे के जैसा था.
ट्रंप ने चुन-चुन कर उड़ाए ठिकाने
अमेरिकी सेना ने जब 28 फरवरी को ईरान पर हमले शुरू किये तो उनके रडार पर सिर्फ तेहरान और ईरान के सैन्य ठिकाने ही नहीं थे, बल्कि वे सभी औद्योगिक केंद्र और बंदरगाह थे, जिन्हें चीन ने अरबों डॉलर खर्च करके खड़ा किया था.
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अमेरिका अब मिडिल ईस्ट की राजनीति को पूरी तरह बदलने पर आमादा है, जहां चीन और रूस जैसे देशों का नामोनिशां तक ना हो. उसके इस राह में सिर्फ ईरान ही एक रोड़ा था. अब अमेरिका ईरान में मौजूद चीन की उस दीवार को ढहा रहा है, जो उसने सालों से मेहनत करके खड़ी की थी. अमेरिका के इस पागलपन की किमत आज भले ही पूरी दुनिया चुका रही है, लेकिन अमेरिका का साफ कहना है कि वह अपनी दादागीरी को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी भी हत तक जा सकता है और कार्रवाई कर सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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