ट्रम्प ने नेतन्याहू को मिली बढ़त का क्रेडिट लिया
Benjamin Netanyahu Israel Election: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हर बात का श्रेय लेने की जैसे बीमारी हो गई है. कल तक जो भारत-पाकिस्तान के बीच ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सीजफायर कराने का क्रेडिट ले रहे थे, अब उन्होंने इजराइल के चुनावों में बेंजामिन नेतन्याहू की जीत का सेहरा भी अपने सिर बांध लिया है.
ट्रंप ने दावा किया है कि नेतन्याहू के पक्ष में खुलकर उतरने के बाद चुनाव का रुख बदल गया. इजरायल में मंगलवार 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के शुरुआती नतीजों में नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन बढ़त बनाए हुए था. हालांकि, शुरुआती आंकड़ों में बढ़त के बावजूद गठबंधन बहुमत के आंकड़े से दूर था और सरकार गठन की तस्वीर साफ नहीं हुई थी.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक संदेश साझा करते हुए दावा किया कि उनके समर्थन से नेतन्याहू चुनावी मुकाबले में वापस आ गए हैं. उन्होंने लिखा,
जब पूरा माहौल बदल गया. अब एक बड़े नेता की करारी हार के बजाय मुकाबला बराबरी का दिख रहा है, यहां तक कि नेतन्याहू की जीत भी हो सकती है
ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर अपने पोस्ट में दावा किया कि नेतन्याहू के समर्थन में ट्रंप के उतरने के बाद इजरायल में चुनावी माहौल बदल गया. नेतन्याहू के लिए मुश्किल माने जा रहे चुनाव में अब उनकी स्थिति मजबूत हो गई है.
यह पोस्ट नेतन्याहू के समर्थन में ट्रंप के खुलकर सामने आने के नौ दिन बाद आया. ट्रंप ने 18 अक्टूबर को नेतन्याहू को मजबूत नेता बताते हुए ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका का अहम सहयोगी बताया था. साथ ही इजरायल के मतदाताओं से उन्हें दोबारा चुनने की अपील की थी.
इसके बाद 25 अक्टूबर को भी ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में संदेश जारी किया. उन्होंने ईरान को लेकर दोनों देशों के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए नेतन्याहू की वापसी को जरूरी बताया था.
शुरुआती नतीजों में बढ़त फिर भी बहुमत से दूर
बता दें कि, इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है. इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है.
बुधवार सुबह तक 55.4 फीसदी मतों की गिनती के बाद सामने आए शुरुआती आंकड़ों में नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 56 सीटें मिलने का अनुमान था. वहीं, विपक्षी गठबंधन 49 सीटों पर आगे था. अरब दलों को 15 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था.
इन आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े से पांच सीट पीछे था. दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन भी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं दिख रहा था.
चुनाव से पहले आए प्रमुख सर्वेक्षणों में भी नेतन्याहू के गठबंधन को बहुमत से दूर रहने का अनुमान जताया गया था. ऐसे में शुरुआती नतीजे उनके लिए उम्मीद से बेहतर जरूर थे, लेकिन इन आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि उनके प्रदर्शन में सुधार ट्रंप के समर्थन की वजह से ही हुआ.
बता दें कि इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं. इसके बाद दलों के बीच गठबंधन बनता है और सरकार का गठन होता है. इसलिए चुनाव में सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरना और सरकार बना लेना दो अलग-अलग बातें हैं.
भारत-पाकिस्तान संघर्ष का भी श्रेय ले चुके हैं ट्रंप
ट्रंप पहले भी अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में अपनी भूमिका को प्रमुखता से पेश करते रहे हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए सैन्य टकराव (ऑपरेशन सिंदूर) के बाद युद्धविराम को लेकर भी उन्होंने कई बार श्रेय लेने की कोशिश की थी.
मई 2025 में दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई के बाद 10 मई को भारत और पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई थी. इसके बाद ट्रंप ने कई बार दावा किया कि अमेरिकी हस्तक्षेप और टैरिफ लगाने की चेतावनी ने दोनों देशों को संघर्ष रोकने के लिए तैयार किया.
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जुलाई 2025 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बैठक के दौरान भी ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था कि उनके प्रशासन ने व्यापार के मुद्दे का इस्तेमाल करके दोनों देशों के बीच लड़ाई रुकवाई.
-भारत एक्सप्रेस
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