मक्का हमले के नाम पर नया दांव?
Houthi Attack: हाल ही में मक्का पर ड्रोन हमले की कोशिश की खबर आई, जिसे सऊदी अरब ने रोकने का दावा किया. लेकिन हूती लड़ाकों ने इसे झूठा बताया और कहा कि सऊदी ने जानबूझकर अफवाह फैलाई. सऊदी ने इस घटना पर कोई ठोस सबूत या तकनीकी जानकारी साझा नहीं की. मक्का मुसलमानों के लिए बेहद भावनात्मक जगह है, इसलिए अगर सऊदी इस बहाने कोई बड़ा फैसला करता है तो उसका विरोध करना मुश्किल होगा.
इजराइल से खुफिया मदद की कोशिश
सऊदी ने अमेरिका से मदद मांगी थी लेकिन वाशिंगटन ने साफ इनकार कर दिया था. इसके बाद सऊदी ने इजराइल से खुफिया जानकारी देने की गुजारिश की. माना जा रहा है कि तेल अवीव इस पर सहमत हो सकता है. यह पहली बार है जब सऊदी ने अपनी सुरक्षा के लिए इजराइल की ओर हाथ बढ़ाया है. जानकारों का कहना है कि सऊदी अब यूएई के रास्ते पर चल रहा है, जिसे ईरान युद्ध के दौरान इजराइल से काफी मदद मिली थी और बाद में उसने अब्राहम समझौते में शामिल होकर रिश्ते मजबूत किए.
पाकिस्तान, सऊदी का साथ क्यों नहीं दिया?
सऊदी ने पाकिस्तान के साथ मक्का समझौता किया था, जिसके तहत हमले की स्थिति में पाकिस्तान को मदद करनी थी. लेकिन जब हूती लड़ाकों ने हमला किया तो पाकिस्तान ने कोई कदम नहीं उठाया. दिलचस्प बात यह है कि इस समझौते से पहले सऊदी ने पाकिस्तान को 2 अरब डॉलर की सहायता दी थी. इसके बावजूद पाकिस्तान के रवैये पर सऊदी ने कोई सख्त प्रतिक्रिया नहीं दी.
अब्राहम समझौता क्या है?
अब्राहम समझौता मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा बदलाव लाने वाला समझौता है. इसका नाम नबी इब्राहीम के नाम पर रखा गया है, जिन्हें ईसाई, यहूदी और इस्लाम धर्म का पूर्वज माना जाता है. अमेरिका ने इस समझौते की नींव रखी थी ताकि मुस्लिम देशों को इजराइल के साथ जोड़कर रक्षा और व्यापार को मजबूत किया जा सके. 2020 में यूएई ने सबसे पहले इसमें शामिल होकर इजराइल को मान्यता दी थी. इसके बाद बहरीन, सूडान और मोरक्को भी इसमें शामिल हुए.
सऊदी की दिलचस्पी क्यों?
सऊदी ने अमेरिका के साथ परमाणु संवर्धन को लेकर समझौता किया है, जिसके तहत वह 20 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन कर सकता है. क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस योजना के पीछे हैं और चाहते हैं कि जल्द से जल्द परमाणु कार्यक्रम शुरू हो. लेकिन इसमें एक शर्त है जब तक सऊदी इजराइल को मान्यता नहीं देता तब तक अमेरिका परमाणु संवर्धन की इजाजत नहीं देगा. यही वजह है कि सऊदी के अब्राहम समझौते में शामिल होने की चर्चा तेज़ हो गई है.
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हूती लड़ाई, मक्का हमले की खबर और पाकिस्तान के पीछे हटने के बाद सऊदी अरब अब नए विकल्प तलाश रहा है. अमेरिका से दूरी और इजराइल से खुफिया मदद की कोशिश इस ओर इशारा करती है कि सऊदी अब्राहम समझौते में शामिल होने की तैयारी कर सकता है. सवाल यही है कि क्या यह कदम सऊदी की सुरक्षा और परमाणु महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने का रास्ता बनेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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