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न रंग, न गंध… पल भर में फेफड़े जाम! नाज़ियों के उस घातक केमिकल की कहानी जिसने जापान को दहला दिया

20 मार्च 1995 को टोक्यो की मेट्रो में ओम शिनरिक्यो कल्ट के सदस्यों ने सरिन गैस का हमला किया, जिसमें 13 लोगों की मौत हुई और हजारों यात्रियों की जिंदगी बदल गई. यह हमला जापान के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है और आज भी केमिकल आतंकवाद की चेतावनी देता है.

जापान के इतिहास में (20 मार्च 1995) टोक्यो हमेशा काले अक्षरों में दर्ज रहेगा. सुबह की भीड़भाड़ वाली मेट्रो ट्रेनें अचानक डरावने हमले का शिकार हो गईं. ओम शिनरिक्यो नामक खतरनाक कल्ट (Doomsday Cult) के सदस्यों ने सरिन गैस का इस्तेमाल करते हुए शहर को हिलाकर रख दिया. इस रासायनिक हमले में 13 लोग मारे गए और हजारों यात्री जिंदगीभर के लिए प्रभावित हो गए.

आखिर क्या हुआ था उस सुबह?

सुबह के करीब 8 बजे थे, जब शहर की तीन मुख्य मेट्रो लाइनों पर पांच लोग सवार हुए. ये आम यात्री नहीं, बल्कि ‘ओम शिनरिक्यो’ नाम के एक खतरनाक डूम्सडे कल्ट (कयामत में विश्वास रखने वाला गिरोह) के सदस्य थे. इनके हाथ में अखबारों में लिपटे कुछ पैकेट थे, जिनमें दुनिया का सबसे घातक केमिकल सरिन भरा हुआ था.

जैसे ही ट्रेनें भीड़भाड़ वाले इलाकों में पहुंचीं, इन हमलावरों ने छतरियों की नोक से उन पैकेटों को फाड़ दिया और चुपचाप अगले स्टेशन पर उतर गए. देखते ही देखते डिब्बों में एक अदृश्य मौत फैलने लगी.

गैस रिसते ही मंजर बदल गया. लोगों की आंखों में भयानक जलन होने लगी, दम घुटने लगा और वे खून की उल्टियां करने लगे. जो लोग कुछ देर पहले अखबार पढ़ रहे थे, वे फर्श पर गिरकर तड़पने लगे. उस हमले में 13 मासूमों की जान गई, लेकिन असली खौफ का अंदाजा इस आंकड़े से लगाइए कि करीब 6,000 लोग इस जहरीली गैस की चपेट में आए.

अस्पतालों में पैर रखने की जगह नहीं थी. किसी की आंखों की रोशनी चली गई थी, तो किसी का शरीर हमेशा के लिए पंगु (paralyzed) हो गया था. आज भी हज़ारों लोग उस हमले के जख्म अपनी सेहत पर झेल रहे हैं.

क्या है सरिन और क्यों है इतनी खतरनाक?

सरिन कोई मामूली जहर नहीं है. यह एक ‘नर्व एजेंट’ है, जिसे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजियों ने विकसित किया था. इसकी सबसे डरावनी बात यह है कि इसका न तो कोई रंग होता है और न ही गंध. यानी जब तक आपको पता चलेगा कि हवा में जहर है, तब तक आपका नर्वस सिस्टम काम करना बंद कर चुका होगा. यह फेफड़ों की मांसपेशियों को लकवा मार देती है, जिससे इंसान घुट-घुट कर दम तोड़ देता है.

कौन था इस तबाही का मास्टरमाइंड?

इस पूरे नरसंहार के पीछे दिमाग था शोको असहारा का. खुद को भगवान बताने वाला यह शख्स मानता था कि दुनिया खत्म होने वाली है और वह हिंसा के जरिए इसे ‘साफ’ करना चाहता था. जब पुलिस ने उसके कल्ट पर शिकंजा कसना शुरू किया, तो ध्यान भटकाने के लिए उसने बेगुनाह लोगों पर यह केमिकल हमला करवा दिया.

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-भारत एक्सप्रेस



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