Bharat Express DD Free Dish

ट्रंप का नाटो से मोहभंग! अमेरिका हटा तो अनाथ हो जाएगा यूरोप? 3 लाख अतिरिक्त सैनिक और अरबों का खर्च; कांप रहे हैं पश्चिमी देश

Donald Trump NATO Exit: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वो नाटो से बाहर निकलने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद वैश्विक जियोपॉलिटिक्स में उथल-पुथल मच गई है. लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि अगर अमेरिका नाटो से अलग होता है तो फिर पश्चिमी देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा.

Donald Trump NATO Exit

अमेरिका हटा तो अनाथ हो जाएगा यूरोप? (AI IMAGE)

Donald Trump NATO Exit: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वो नाटो से बाहर निकलने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. ईरान युद्ध में नाटो देशों के रवैये से वो बेहद गुस्से में हैं.

ट्रंप ने एक न्यूज चैनल को दिये इंटरव्यू में नाटो को कागजी शेर बताया. उन्होंने कहा, ” मैं नाटो से कभी प्रभावित नहीं हुआ. अब इसकी सदस्यता पर दोबारा विचार कर रहा हूं. यह कोई विकल्प नहीं है बल्कि उससे भी आगे की बात है. मुझे हमेशा पता था कि नाटो एक कागजी शेर है और यह बात रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी जानते हैं.”

डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद वैश्विक जियोपॉलिटिक्स में उथल-पुथल मच गई है. लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि अगर अमेरिका नाटो से अलग होता है तो फिर पश्चिमी देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा और सबसे अहम बात रूस का अगला कदम क्या होगा?

NATO कब बना?

दूसरे विश्वयुद्ध में सोवियत संघ की ताकत को देख पश्चिमी देश डर गए. उन्हें यह डर सताने लगा कि कहीं सोवियत संघ (USSR) यूरोपीय देशों को निशाना ना बनाने लगे. जैसे ही दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ, अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में यूरोपीय देशों की मीटिंग हुई और एक नया गुट बनाने का निर्णय लिया गया. इस गुट से सोवियत संघ को बाहर रखा गया. 4 अप्रैल 1949 को कुल 12 देशों ने मिलकर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) का निर्माण किया. बाद में इसमें कई यूरोपीय देश भी जुड़ गए. साल 2024 तक नाटो के सदस्य देशों की संख्या 32 थी. फिनलैंड और स्वीडन नाटो के सबसे नए मेंबर हैं.

नाटो का मुख्य उद्वेश्य सदस्य देशों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा करना है. इसका आर्टिकल 5 बेहद महत्वपूर्ण है. जिसमें लिखा गया है कि अगर कोई देश किसी नाटो सदस्य देश पर हमला करता है तो यह सभी देशों पर हमला माना जाएगा और उस दुश्मन का मुकाबला सभी देश मिलकर करेंगे. आजतक सिर्फ एक बार ही इसका तब उपयोग किया गया, जब अमेरिका में 9/11 हमला हुआ था. अब अमेरिका इस संगठन से बाहर निकलने की बात कह रहा है. अगर ऐसा होता है तो फिर रूस क्या करेगा?

NATO के लिए कितना जरूरी है USA?

नाटो बनाने का मुख्य उद्वेश्य यूएसएसआर की बढ़ती ताकत थी. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय देश तबाह हो चुके थे. उनके पास रक्षा पर खर्च करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा था. ऐसे में अमेरिका आगे आकर उन्हें सुरक्षा छतरी (nuclear umbrella) दिया. जो आजतक चलता आ रहा है.

अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकल जाए तो यूरोप की ताकत बेहद कमजोर पड़ जाएगी. विशेषज्ञों के अनुसार यूरोप को 3 लाख अतिरिक्त सैनिक और 230 बिलियन यूरो सालाना अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे. जो यूरोप की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका के बाहर निकलते ही EU को अपना डिफेंस यूनियन बनाना पड़ेगा. लेकिन फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के बीच न्यूक्लियर छतरी (nuclear umbrella) को लेकर बहस तेज हो जाएगी, क्योंकि जर्मनी इस स्थिति में खुद न्यूक्लियर हथियार बनाने की सोचेगा. जर्मनी के अतीत को देखते हुए ये बात ही बाकि यूरोपीय देशों को डराने के लिए काफी है. ऐसे में यूरोप में पूर्वी बनाम पश्चिम जैसी फूट देखने को मिल सकती है.

क्या रूस आक्रामक हो जाएगा?

19 मार्च 2019 के अपने लेख ‘नाटो के बिना जीवन के 5 परिणाम’ डिफेंस स्तंभकार हंस बिनेनडिजक लिखते हैं कि नाटो के विघटन में रूस सबसे बड़ा विजेता बनकर निकलेगा. बिना अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के पुतिन बाल्टिक देशों और ब्लैक सी पर अपना कंट्रोल स्थापित कर लेंगे.

हंस बिनेनडिजक आगे लिखते हैं कि यूरोप में अमेरिकी अनुपस्थिति से क्षेत्र में हाइब्रिड वॉर बढ़ेगा.

डेनिश इंटेलिजेंस और नाटो महासचिव की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक रूस 4-5 सालों में बड़े युद्ध के लिए तैयार है. अमेरिका के निकास से पुतिन के लिए यह बेहद आसान हो जाएगा. मास्को नाटो को मृत मानकर पूर्व सोवियत क्षेत्रों पर दबदबा बढ़ाएगा.

कई लोग नहीं रखते इत्तेफाक

हालांकि कई डिफेंस एक्सपर्ट इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि पुतिन भले ही सोवियत संघ के विघटन को एक त्रासदी मानते हैं, लेकिन वो उन क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लेने में दिलचस्पी नहीं रखते.

इस विषय पर पुतिन का भी एक मशहूर बयान है जिसमें वो कहते हैं,

जिस किसी को भी सोवियत संघ के पतन का अफसोस नहीं है, उसके पास दिल नहीं है। और जो कोई भी इसे इसके पुराने स्वरूप में फिर से बनाना चाहता है, उसके पास दिमाग नहीं है.

ये भी पढ़ें- ब्रिटेन ने ट्रंप को दिखाई औकात! “यह हमारी जंग नहीं” कहकर झाड़ा पल्ला, अब बुलाई 35 देशों की मीटिंग

अमेरिका के नाटो से बाहर निकलने पर भले ही यूरोपीय देश कमजोर पड़ जाएंगे, लेकिन यह पक्का नहीं कहा जा सकता कि उनकी इस स्थिति का पुतिन फायदा उठाकर उनपर आक्रमण कर देंगे. पुतिन पुरानी कम्युनिस्ट व्यवस्था के हमेशा से खिलाफ रहे हैं. हालांकि वो स्पष्ट रूप से उस रूसी साम्राज्य के प्रभाव को वापस लाना चाहते हैं, जहां मास्को का अपने आस-पड़ोस के देशों पर राजनीतिक, सांस्कृतिक और सैन्य नियंत्रण था.

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read