दिल्ली हाईकोर्ट.
दिल्ली हाई कोर्ट ने किशोर प्रेम से जुड़े आपराधिक मामलों में सजा के बजाय समझ को प्राथमिकता देने वाले सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण अपनाने को कहा है. अदालत ने कहा कि कानून को ऐसे संबंधों को स्वीकार करने के लिए विकसित किया जाना चाहिए जो सहमति से बने हो और जबरदस्ती से मुक्त हों. जस्टिस जसमीत सिंह ने यह पुष्टि करते हुए कहा कि सहमति से और सम्मानजनक किशोर प्रेम मानव विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा है.
प्यार एक मौलिक मानवीय अनुभव है- कोर्ट
किशोरों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और अपराधीकरण के डर के बिना संबंधों में संलग्न होने की अनुमति दी जानी चाहिए. उन्होंने कहा मेरा मानना है कि किशोर प्रेम पर सामाजिक और कानूनी विचारों को युवा व्यक्तियों के शोषण और दुर्व्यवहार से मुक्त रोमांटिक संबंधों में संलग्न होने के अधिकारों पर जोर देना चाहिए. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्यार एक मौलिक मानवीय अनुभव है और किशोरों को भावनात्मक संबंध बनाने का अधिकार है. कानून को इन रिश्तों को स्वीकार करने और सम्मान देने के लिए विकसित किया जाना चाहिए, जब तक कि वे सहमति से हो और जबरदस्ती से मुक्त हो.
पिता ने पुलिस में दर्ज कराई थी शिकायत
अदालत ने कहा कि कानून बक ध्यान प्रेम को दंडित करने के बजाए शोषण और दुर्व्यवहार को रोकने पर होना चाहिए. सहमति और सम्मानजनक किशोर प्रेम मानव विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा है. दिसंबर 2014 में, लड़की के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी नाबालिग बेटी ट्यूशन से घर नहीं लौटी है. उस व्यक्ति के खिलाफ आशंका जताई गई थी, क्योंकि वह अपने घर से भी लापता था. जिस समय लड़की अपने प्रेमी के साथ गई थी उस समय उसकी उम्र 16 साल थी.
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यौन उत्पीड़न करने का मामला किया गया दर्ज
लड़की की पिता के शिकायत पर पुलिस ने लड़के के खिलाफ नाबालिग का कथित रूप से यौन उत्पीड़न करने का मामला दर्ज किया गया था. अदालत ने व्यक्ति को बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए निचली अदालत के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि बरी करने बक आदेश तर्कसंगत था तथा इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नही है.
-भारत एक्सप्रेस
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