सांकेतिक फोटो सोशल मीडिया
दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत आतंकवादियों को शरण देना एक गंभीर अपराध है. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे कृत्य आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाह प्रदान करते हैं और इससे नागरिकों की सुरक्षा और जीवन खतरे में पड़ जाते हैं. जस्टिस प्रतिबा मनिंदर सिंह और जस्टिस अमित शर्मा की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि यह देश में समाज में अशांति का कारण बनता है और अगर इसे रोका नहीं गया तो यह गैरकानूनी गतिविधियों को वैधता प्रदान कर सकता है.
सुरक्षित पनाहगाह से बढ़ता आतंकवाद
कोर्ट ने यह भी कहा कि आतंकवादियों को भोजन और आश्रय प्रदान करने से उन्हें अपने कृत्य करने के लिए सुरक्षित स्थान मिलता है, जिससे आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है. ऐसे कृत्यों के जरिए आतंकवादी संगठनों को समर्थन मिलता है और वे समाज में अस्थायी रूप से घुलमिल जाते हैं. इससे आतंकवादी समय आने पर अपनी योजना को अंजाम देने के लिए तैयार रहते हैं. अदालत ने कहा कि इस तरह के कृत्य आतंकवादियों को घेरने और उन्हें अपने मकसद को पूरा करने में मदद करते हैं.
आरोपी को जमानत से इनकार
अदालत ने इस मामले में आरोपी जहूर अहमद पीर को जमानत देने से इनकार कर दिया. पीर पर आरोप था कि उसने पाकिस्तान के नागरिक बहादुर अली को शरण दी थी. बहादुर अली लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य था और उसने भारत में घुसपैठ कर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया था. कोर्ट ने उसकी जमानत के लिए दी गई अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया. पीर को 2017 में गिरफ्तार किया गया था और उस पर यूएपीए, विस्फोटक अधिनियम, शस्त्र अधिनियम, विदेशी अधिनियम और वायरलेस अधिनियम के तहत दंडनीय अपराधों का आरोप है.
इस फैसले के माध्यम से अदालत ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है और यह स्पष्ट किया कि आतंकवादियों को शरण देने से समाज में अस्थिरता बढ़ती है, जो देश की सुरक्षा के लिए खतरे का कारण बन सकता है. यह निर्णय यूएपीए के तहत आतंकवादियों के लिए शरण देने वाले व्यक्तियों के लिए एक कड़ा संदेश है.
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