दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में जजों के लिए आवासीय फ्लैटों के निर्माण की लंबित परियोजना के लिए राशि देने में कोताही बरतने को लेकर दिल्ली सरकार की खिंचाई की. मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने सरकार को याद दिलाया कि जजों को पर्याप्त आधिकारिक आवास प्रदान करना सभी के लिए प्राथमिकता होनी चाहिए. कोर्ट ने फिर सरकार के आासन पर लंबित आवास परियोजनाओं को पूरा करने के लिए धन की मंजूरी और जारी करने के संबंध में सकारात्मक निर्णय लेने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया. उसमें द्वारका और सीबीडी प्लाट शाहदरा में भूमि शामिल है.
याचिकाकर्ता के वकील को यह भी निर्देश दिया कि वे जवाब दाखिल करें कि क्या कोई भूमि उपलब्ध है जिसका उपयोग जजों के आधिकारिक आवास के निर्माण के लिए किया जा सकता है. साथ ही सुनवाई 3 अप्रैल के लिए स्थगित कर दी. इससे पहले कोर्ट को सूचित किया गया था कि जजों की कुल स्वीकृत संख्या 897 के मुकाबले उपलब्ध फ्लैटों की संख्या 348 है, जो कई स्थानों पर है. इस प्रकार 549 फ्लैटों की कमी है.
सरकार द्वारा बैठक स्थगित करने पर कोर्ट की नाराजगी
पीठ ने कहा कि जजों के काम व कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार और अन्य सभी प्राधिकरणों व निकायों के अधिकारियों को उन्हें फ्लैट मुहैया कराया जाना प्राथमिकता होनी चाहिए. पिछले साल 9 दिसंबर को भी सरकार के वकील ने कहा था कि लंबित परियोजनाओं के लिए वित्त सुनिश्चित करने एवं जजों को आवास का निर्माण के लिए धन आवंटन पर 10 दिसंबर को बैठक होगी, लेकिन सरकार के वकील ने बुधवार को बताया कि विधानसभा चुनाव की वजह से उक्त तिथि को कोई बैठक नहीं हुई.
इस पर कोर्ट ने कहा कि एक बार जब उसे बताया गया कि 10 दिसंबर, 2024 को बैठक होनी है, तो सूचना देने के बावजूद ऐसी बैठक न करना उचित नहीं है. अब चुनाव बीत चुका है और यह प्राथमिकता क्यों नहीं है? हम दिखावटी बातें पसंद नहीं करते. हमें दीवार के सामने मत धकेलिए. अपने अधिकारियों को यह सब समझाइए. हम आपसे क्या पूछ रहे हैं? हम आपसे केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने के लिए कह रहे हैं. बस इतना ही आप अपने अधिकारियों को सरल बात भी नहीं समझा पा रहे हैं.
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

