दिल्ली हाईकोर्ट (प्रतीकात्मक फोटो)
दिल्ली की एक अदालत ने वर्ष 1999 से लंबित एक संपत्ति विवाद पर फैसला सुनाते हुए कहा कि जब किसी मामले को निपटाने में 26 साल लग जाते हैं, तो न्यायिक प्रणाली को अपनी जिम्मेदारी बॉटनी चाहिए. जिला न्यायाधीश मोनिका सरोहा ने कहा कि यह उनके पास सबसे पुराना लंबित मुकदमा था. मुकदमा करीबी पारिवारिक सदस्यों के बीच एक गहरे दर्दनाक विवाद से उत्पन्न हुआ था.
ऐसे मामलों ने अदालत को याद दिलाया कि हर केस फाइल के पीछे रिश्तों की व्यक्तिगत कहानी होती है, जो तनावपूर्ण होता है. उसमें समय बर्बाद होता है. यह याद दिलाता है कि न्याय का मार्ग कितना लंबा, थकाऊ और प्रक्रियात्मक रूप से बोझिल हो सकता है.
अशोक कुमार जेरथ की याचिका और उसकी मांग
अदालत ने यह टिप्पणी अशोक कुमार जेरथ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है. अशोक कुमार जेरथ ने अपनी याचिका में अपने पिता, भाई, भाभी और दो बहनों सहित प्रतिवादियों के खिलाफ दाखिल एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान की है. उस.मुकदमें के यह घोषित करने की मांग की गई थी कि उनके पिता ने जो कुछ संपत्तियां हस्तांतरित की है वह शून्य व अमान्य है.
अदालत ने कहा कि याचिकककर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि वह हस्तांतरित संपत्तियों के अकेले मालिक है. उन्होंने कहा कि दुखद बात यह है कि याचिकाकर्ता जिसने यह मुकदमा दाखिल किया और अधिकांश प्रतिवादी जिनके खिलाफ यह मुकदमा मूल रूप से वर्ष 1999 में दाखिल किया गया था, वे अब मर चुके हैं. यह मामला एक कानूनी इतिहास के रूप में खड़ा है जो इसके पक्षों से आगे निकल गया है.
यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि न्याय का मार्ग कितना लंबा, थकाऊ और प्रक्रियात्मक रूप से बोझिल हो सकता है. अदालत ने कहा कि जब किसी मामले को हल होने में 26 साल लग जाते हैं, तो अदालत सहित न्यायिक प्रणाली को दोष और जिम्मेदारी बाटने चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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