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बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण को लेकर दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 10 जुलाई को करेगा सुनवाई

बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट 10 जुलाई को सुनवाई करेगा. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेदों और नागरिकों के मताधिकार का उल्लंघन करती है.

Telangana News, Supreme Court, OBC Reservation
Edited by Akansha

बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण को लेकर दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट जल्द सुनवाई को तैयार हो गया है. जस्टिस सुधांशू धुलिया और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ 10 जुलाई को याचिका पर सुनवाई करेगी। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मेंशन कर कहा कि आयोग का फैसला सही नहीं है. लिहाजा याचिका पर जल्द सुनवाई कर ली जाए. यह याचिका एडीआर, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, योगेंद्र यादव, आरजेडी नेता मनोज झा सहित अन्य की ओर से दायर की गई है.

चुनाव आयोग का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद का करता है उल्लंघन

आरजेडी नेता मनोज झा की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है. उन्होंने कहा कि इस तरह से विशेष पुनरीक्षण से कई मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं, जिसके बड़े पैमाने पर नागरिकों के वोटिंग अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. एडीआर द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग के इस फैसले से लाखों मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं. आयोग का यह फैसला मनमाना और गलत है. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल दें.

याचिकाकर्ता के अनुमान के मुताबिक करीब तीन करोड़ ऐसे प्रवासी मतदाता है जो आयोग के इस फैसले के बाद मताधिकार से वंचित हो सकते हैं. खासकर कमजोर वर्गों से आने वाले लोग, अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं. याचिकाकर्ता का मानना है कि आयोग का यह आदेश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रक्रिया को कमजोर करता है. आयोग द्वारा शुरू किए गए विशेष सघन मतदाता सूची पुनरीक्षण से ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता काफी परेशान है, क्योंकि पहचान के तौर पर जो दस्तावेज उनसे मांगा जा रहा है, उस उनके पास मौजूद नहीं है.

याचिकाकर्ता का दावा

याचिकाकर्ता का दावा है कि यह आदेश मनमाना, संविधान के मौलिक अधिकारों यानी अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता), अनुच्छेद 325 और अनुच्छेद 326 (चुनावी अधिकार) का उल्लंघन करता है. इसके अलावे आयोग का यह आदेश जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 की धारा 21 ए का भी उल्लंघन करता है.

वहीं टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से दायर याचिका पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित में दायर वर्तमान रिट याचिका में भारत निर्वाचन आयोग के 24 जून को जारी आदेश को रद्द करने की मांग की गई है. उन्होंने याचिका में कहा है कि आयोग का यह आदेश बिहार में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण किया जा रहा है. जो संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1)(ए), अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 325, अनुच्छेद 328 व जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के प्रावधानों का उल्लंघन करता है.

विपक्ष लगा रहा है आरोप

विपक्ष आरोप लगा रहा है कि यह प्रक्रिया गरीब, वंचित और अल्पसंख्यक समुदायों को मतदाता सूची से हटाने की साजिश है. बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को हर मतदाताओं तक वितरण के लिए 8 करोड़ गणाना फॉर्म उपलब्ध कराया गया है, ताकि घर जाकर मतदाताओं से भराया जा सके. इस दौरान 1 जनवरी 2023 तक वोटर लिस्ट में शामिल 3.16 करोड़  वोटरों को दोबारा अपनी जानकारी की पुष्टि करनी होगी. बाकी 4.74 करोड़ वोटर्स को पहचान और निवास का सबूत देना होगा, इसके बाद 11 दस्तावेज तय किया गया है. जाति प्रमाण पत्र या निवास प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, 10 वी की मार्कशीट, आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आई कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और मनरेगा जॉब कार्ड शामिल है.

-भारत एक्सप्रेस 



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