Sawan2025: सावन माह में बांदा जनपद स्थित कालिंजर फोर्ट के मंदिर में शिवलिंग की पूजा अर्चना करने दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं. इसे नीलकंठ महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. यह एक प्राचीन और पवित्र स्थल है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, और यहाँ का शिवलिंग नीले पत्थर से बना हुआ है. इस मंदिर की विशेषता यह है कि यह एक छोटी सी गुफा में स्थित है, जिसके सामने एक सुंदर मंडप है. लोगों की मान्यता है कि यहां आकर पूजा अर्चना करने से जीवन के सभी पाप धुल जाते हैं.

नीलकंठ महादेव मंदिर का इतिहास और महत्व
नीलकंठ महादेव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव ने देवताओं और राक्षसों के समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को इसी स्थान पर पीया था, जिससे उनका कंठ नीला हो गया था.
मंदिर की वास्तुकला गुप्त काल की है, जबकि मंडप के स्तंभ चंदेल काल के हैं. यहां की किले की दीवारों पर लगी देवी देवताओं की मूर्तियां लोगों का मन मोह लेती हैं. कालिंजर फोर्ट की दीवारों और कई स्थानों पर लगभग 2000 ऐतिहासिक मूर्तियां हैं जिनमें अधिकतर भगवान शिव की अदभुत वास्तुकला से भरपूर दुर्लभ मूर्तियां हैं.
यह मंदिर एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ भक्त भगवान शिव की पूजा करते हैं और सावन में यहां बड़ा मेला भी लगता है.25 फीट की नटराज की मूर्ति लोगो का मन मोह लेती है
कालिंजर फोर्ट- यह एक ऐतिहासिक किला है, जो अपनी मजबूत दीवारों और विशाल द्वारों के लिए प्रसिद्ध है. यहां कई बड़े प्राकृतिक जलाशय हैं, जो अपनी खूबसूरती और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जाने जाते हैं . भगवान शिव के मंदिर के पास नटराज की तांडव मुद्रा में एक विशालकाय मूर्ति कालिंजर फोर्ट की दीवार पर बनी हुई है और इस प्रतिमा पर लगातार प्राकृतिक जलधारा गिरती रहती है, इसको देखने से भर से मन में तमाम सवाल उठते हैं कि ये इतनी विशालकाय मूर्ति पहाड़ों को काटकर कैसे बनाई गई होगी और इसके बनाने वाले मूर्तिकार ने उस समय की लाजवाब स्थापत्य कला को प्रदर्शित किया है.
अजेय दुर्ग है कालिंजर का किला
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कालिंजर बुंदेलखंड का ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर है। प्राचीन काल में यह जेजाकभुक्ति (जयशक्ति चन्देल) साम्राज्य के अधीन था। यहां का किला भारत के सबसे विशाल और अपराजेय किलों में एक माना जाता है। 9वीं से 15वीं शताब्दी तक यहां चन्देल शासकों का शासन था। चन्देल राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह सूरी और हुमांयू ने आक्रमण किए लेकिन जीतने में असफल रहे। अनेक प्रयासों के बावजूद मुगल कालिंजर के किले को जीत नहीं पाए. रानी दुर्गावती का जन्म भी इसी किले में हुआ था.
चित्रकूट से सिर्फ 40 km की दूरी पर है कालिंजर फोर्ट
1569 में अकबर ने यह किला जीता और अपने नवरत्नों में एक बीरबल को उपहारस्वरूप प्रदान किया. बीरबल के बाद यह किला बुंदेल राजा छत्रसाल के अधीन हो गया. छत्रसाल के बाद किले पर पन्ना के राजा हरदेव शाह का अधिकार हो गया। 1812 में यह किला अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया. एक समय कालिंजर चारों ओर से ऊंची दीवार से घिरा हुआ था और इसमें चार प्रवेश द्वार थे. वर्तमान में कामता द्वार, पन्ना द्वार और रीवा द्वार नामक तीन प्रवेश द्वार ही शेष बचे हैं. चित्रकूट से सिर्फ 40 किलोमीटर है और दूसरा रास्ता चित्रकूट से 70 किलोमीटर का है जो नरैनी होकर है जाता है.
कालिंजर दुर्ग उत्तर प्रदेश के बांदा जिला के कालिंजर नामक स्थान पर स्थित है. विंध्याचल की पहाड़ी पर 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह लगभग 8 किलोमीटर क्षेत्रफल में बसा हुआ है.
किले में है कई महल और जलाशय
यह किला इतिहास के उतार-चढ़ावों का प्रत्यक्ष गवाह है. किले में आलमगीर दरवाजा, गणेश द्वार, चौबुरजी दरवाजा, बुद्ध भद्र दरवाजा, हनुमान द्वार, लाल दरवाजा और बारा दरवाजा नामक सात द्वारों से प्रवेश किया जा सकता है. किले के भीतर राजा महल और रानी महल नामक शानदार महल बने हुए हैं. महल में सीता सेज नामक एक छोटी गुफा है जहां एक पत्थर का पलंग और पत्थर का बना तकिया रखा हुआ है. किले में जलाशय भी है जिसे पाताल गंगा नाम से जाना जाता है। किले के बुद्धा बुद्धी ताल के जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है.

नीलकंठ मंदिर में होती रही है तंत्र मंत्र की साधना
किले में पुरातात्विक महत्त्व की लगभग 2000 से ज्यादा मूर्तियां है जिसमे से एक 25 फीट की विशालकाय नटराज की मूर्ति है. किले में स्थित नीलकंठ महादेव को तिलिस्म का मंदिर के रूप में भी जाना जाता है. कहा जाता है कि यहाँ के चंदेल राजा इस नीलकंठ मंदिर में तंत्र-मंत्र की साधना किया करते थे. इस मंदिर में आज भी यहाँ के स्थानीय निवासी तंत्र-मन्त्र साधना करते हुए नजर आ जाते हैं. इस मंदिर की बनाबट भी अद्भुत है , मंदिर तक आने के लिए 100 से ज्यादा घुमावदार सीढ़ियां जो पहाड़ काटकर बनाई गईं है और मंदिर से चारों ओर का नजारा प्राकृतिक सौंदर्य से भरा पड़ा है.
कालिंजर फोर्ट पर हमला करने के दौरान हुई थी शेरशाह सूरी की मौत
तत्कालीन देश के शासक शेरशाह सूरी ने 1545 में इस किले पर आक्रमण किया. उसकी सेना 2 महीने से ज्यादा तोप गोलों से किले पर आक्रमण करती रही लेकिन कालिंजर की मोटी व मजबूत दीवारों के कारण सफलता नहीं मिली. इस असफलता को सफलता में बदलने के लिए भारत के तत्कालीन शासक शेरशाह सूरी खुद सेना की कमान संभालने कालिंजर आ गया , उसने कालिंजर किले की ओर तोपों से गोले चलवाने शुरू कर दिए , कुछ गोले नीलकंठ महादेव मंदिर की दीवार पर भी गिरे और उसी दौरान बारूद में हुए विस्फोट से उसकी मौत हो गयी. स्थानीय लोगो की अगर मानें तो यह नीलकंठ महादेव का प्रकोप था जिस कारण उसको अपनी जान गंवानी पड़ी. शेरशाह सूरी ने ही जीटी रोड का निर्माण कराया था, जिससे भारत में लोगों को आवागमन में काफी सुविधाएं मिल गई थीं.
-भारत एक्सप्रेस
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