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स्वच्छ ऊर्जा की दौड़ में चीन का बढ़ता वर्चस्व!

अमेरिका जहां तेल और गैस पर दांव लगा रहा है, वहीं चीन स्वच्छ ऊर्जा में विश्व नेतृत्व हासिल कर रहा है. यह न सिर्फ आर्थिक संतुलन बल्कि एआई और भविष्य की तकनीकी क्रांति को भी प्रभावित करेगा. भारत को इससे सबक लेकर स्वदेशी नवाचार पर ध्यान देना होगा.

China Clean Energy Leadership

आज की दुनिया में ऊर्जा नीतियां सिर्फ आर्थिक निर्णय नहीं हैं, बल्कि वैश्विक वर्चस्व की कुंजी हैं. जब अमेरिका तेल और गैस पर दांव लगाकर पुरानी राह पर लौट रहा है, वहीं चीन स्वच्छ ऊर्जा क्रांति को गति दे रहा है. यह विरोधाभास न केवल आर्थिक असंतुलन पैदा कर रहा है, बल्कि भविष्य की तकनीकी दिग्गजों—जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)—के लिए बुनियादी ढांचे को भी प्रभावित कर रहा है. साइरस जेन्सेन की हालिया वीडियो ‘अमेरिका जस्ट मेड द ग्रेटेस्ट मिस्टेक ऑफ द 21वीं सेंचुरी’ इस मुद्दे को बेबाकी से उजागर करती है.

अमेरिका, जो कभी नवाचार का प्रतीक था, अब अपनी ऊर्जा नीतियों में उल्टा चढ़ाव दिखा रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, अमेरिका ने अलास्का में 44 अरब डॉलर का प्राकृतिक गैस प्रोजेक्ट शुरू किया था. जनरल मोटर्स जैसी कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की योजनाओं को रद्द कर रही हैं और वी8 गैस इंजनों पर लौट रही हैं. यहां तक कि ईवी खरीद पर टैक्स क्रेडिट भी समाप्त कर दिए गए हैं. यह सब तब हो रहा है जब दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है और नवीकरणीय ऊर्जा ही भविष्य का रास्ता दिख रही है.

जेन्सेन की वीडियो में साफ कहा गया है कि अमेरिका की यह रणनीति अल्पकालिक लाभ के लिए है. तेल और गैस निर्यात बढ़ाने से तत्काल आर्थिक फायदा तो मिलेगा, लेकिन लंबे समय में यह वैश्विक बाजारों में पीछे धकेल देगा. अमेरिका ने 1950 के दशक में सोलर पैनल विकसित किए थे, 1970 के दशक में लिथियम-आयन बैटरी का आविष्कार किया, लेकिन रोनाल्ड रीगन जैसे नेताओं ने जिमी कार्टर के व्हाइट हाउस सोलर पैनल हटाकर इसकी उपेक्षा की. आज भी वही पुरानी सोच हावी है. परिणामस्वरूप, अमेरिका ईवी निर्यात में मात्र 12 अरब डॉलर और बैटरी निर्यात में 3 अरब डॉलर पर सिमट गया है, जबकि सोलर पैनल निर्यात तो महज 69 मिलियन डॉलर का है.

यह भूल सिर्फ आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक भी है. वैश्विक दक्षिण—जो सौर और पवन ऊर्जा के 70 प्रतिशत स्रोतों और महत्वपूर्ण खनिजों के 50 प्रतिशत का नियंत्रण रखता है—अब नवीकरणीय ऊर्जा की ओर मुड़ रहा है. अमेरिका का जीवाश्म ईंधन पर फोकस इन देशों को अलग-थलग कर देगा, जबकि चीन इनके साथ साझेदारी कर रहा है. वहीं, चीन ने स्वच्छ ऊर्जा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया है. 2024 में चीन ने दुनिया के बाकी देशों से ज्यादा विंड टर्बाइन और सोलर पैनल लगाए. ईवी और बैटरी स्टोरेज में निवेश ने इसे वैश्विक नेता बना दिया है. पिछले साल चीन ने 38 अरब डॉलर के ईवी निर्यात किए, 65 अरब डॉलर की बैटरी बेचीं, और सोलर पैनल के 40 अरब डॉलर के निर्यात किए. स्वच्छ ऊर्जा पेटेंट में चीन के पास 7 लाख से ज्यादा हैं, जो दुनिया के आधे से अधिक हैं.

जेन्सेन उद्धृत करते हुए बताते हैं कि चीन की सफलता का राज समन्वित प्रयास है. सीएल के सह-अध्यक्ष शिएन पैन कहते हैं, “चीन को लंबे लक्ष्य पर प्रतिबद्ध करना मुश्किल है, लेकिन जब हम प्रतिबद्ध होते हैं, तो समाज के हर पहलू—सरकार, नीति, निजी क्षेत्र, इंजीनियरिंग—सभी एक ही लक्ष्य की ओर कड़ी मेहनत करते हैं.” यह दृष्टिकोण अमेरिका की छिटपुट नीतियों से बिल्कुल अलग है.

चीन अब वैश्विक बाजारों में फैल रहा है. ब्राजील, थाईलैंड, मोरक्को और हंगरी में ईवी और बैटरी फैक्टरियां बना रहा है. हंगरी में 8 अरब डॉलर का कारखाना, इंडोनेशिया में 11 अरब डॉलर का सोलर प्लांट—ये निवेश न केवल आर्थिक, बल्कि भू-राजनीतिक लाभ भी दे रहे हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से जेन्सेन कहते हैं, “ईवी बैटरी बनाने वाले देश दशकों तक आर्थिक और भू-राजनीतिक फायदे काटेंगे. अभी तक का एकमात्र विजेता चीन है.”

पिछले 15 वर्षों में चीन ने बिजली उत्पादन में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है. यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई जैसी उभरती तकनीकें बिजली पर निर्भर हैं. चीन का स्वच्छ ऊर्जा निवेश न केवल पर्यावरण बचाएगा, बल्कि एआई क्रांति में भी नेतृत्व देगा. आरएमआई की ‘पावरिंग अप द ग्लोबल साउथ’ रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक दक्षिण के 70 प्रतिशत सौर-पवन संसाधन चीन की रणनीति से जुड़ रहे हैं.

यह संघर्ष सिर्फ दो महाशक्तियों का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है. वैश्विक दक्षिण—अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया—अब सस्ती और सतत ऊर्जा की तलाश में है. चीन ने इन देशों में सस्ते सोलर पैनल और ईवी तकनीक पहुंचाई है, जबकि अमेरिका के महंगे गैस प्रोजेक्ट इनके लिए बोझ साबित हो रहे हैं. परिणाम? ये देश चीन की ओर झुक रहे हैं.

भारत के संदर्भ में देखें तो यह चेतावनी स्पष्ट है. हमारी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘प्लेड्ज फॉर क्लाइमेट’ पहलें स्वच्छ ऊर्जा पर केंद्रित हैं, लेकिन चीन का वर्चस्व चुनौती है. भारत सोलर और विंड में प्रगति कर रहा है, लेकिन बैटरी और ईवी चिप्स में आयात पर निर्भरता बनी हुई है. यदि हम चीन की तरह समन्वित नीति नहीं अपनाते, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पीछे रह जाएंगे. अमेरिका की गलती से सबक लेते हुए, भारत को स्वदेशी नवाचार पर जोर देना चाहिए—जैसे लिथियम खनन और बैटरी रिसाइक्लिंग में निवेश.

अमेरिका की यह भूल नई नहीं है. 20वीं सदी में जापान ने इलेक्ट्रॉनिक्स में अमेरिका को पीछे छोड़ा था, क्योंकि अमेरिका ने अल्पकालिक लाभ को प्राथमिकता दी. आज चीन स्वच्छ ऊर्जा में वही कर रहा है. जेन्सेन की वीडियो एक चेतावनी है: जो देश बिजली उत्पादन में आगे होगा, वही एआई और अगली औद्योगिक क्रांति जीतेगा.

अमेरिका को अपनी नीतियां पलटनी होंगी—ईवी सब्सिडी बहाल करनी होंगी, नवीकरणीय अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा. लेकिन समय कम है. चीन का बढ़त 10 वर्षों का नहीं, बल्कि दशकों का हो सकता है. अमेरिका ने 21वीं सदी की सबसे बड़ी गलती कर दी है—जीवाश्म ईंधन पर दांव लगाकर स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य को गंवा दिया. चीन का उदय एक सबक है: समन्वित, दूरदर्शी नीतियां ही विजेता बनाती हैं. भारत जैसे देशों को इस दौड़ में शामिल होना चाहिए, ताकि हम न केवल पर्यावरण बचाएं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी हासिल करें. समय आ गया है कि दुनिया एकजुट होकर स्वच्छ ऊर्जा को अपनाए. अन्यथा, इतिहास हमें माफ नहीं करेगा.

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-भारत एक्सप्रेस 



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