दिल्ली हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच संपत्ति विवाद से संबंधित मामले में एक अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई संपत्ति पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर है, तो पति अकेले मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता है. क्योंकि संपत्ति का पूरी पैसा या ईएमआई उसने चुकाया हैं.
पति अकेला मालिक नहीं
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हर्ष वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने यह आदेश दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि एक बार जब संपत्ति पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर दर्ज हो जाती है, तो पति यह नहीं कहा सकता कि वह अकेला मालिक है, क्योंकि उसने ही पूरा पैसा दिया है.
कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा तलाक पर लगाए गए मानसिक क्रूरता से संबंधित आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा है. कोर्ट ने कहा कि भले ही कुछ घटनाए हुई हों, लेकिन पति ने खुद माना कि दोनों एक-दूसरे से मिलते और साथ घूमने जाते रहे, जिससे साफ है कि या तो आरोप क्षमा कर दिए गए थे या फिर वे इतने गंभीर नही थे कि मानसिक या शारीरिक क्रूरता साबित हो सके. इसलिए फैमली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है.
पत्नी को हर माह 2 लाख देने का निर्देश
कोर्ट ने पति को तलाक याचिका के निपटारे तक पत्नी को प्रत्येक महीने 2 लाख रुपए प्रति माह देने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि ऐसा दावा बेनामी संपत्ति कानून की धारा 4 के तहत इस तरह के दावे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है. धारा में यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो वास्तविक मालिक होने का दावा करता है और न ही किसी मुकदमें में अपना बचाव इस आधार पर कर सकता है कि संपत्ति उसके नाम पर नहीं बल्कि किसी और के नाम पर है.
बता दें कि कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में यह फैसला दिया है. जबकि पत्नी ने भी याचिका दायर कर फैमली अदालत के फैसले में संशोधन की मांग और भरण पोषण से संबंधित राशि को बढ़ाने की मांग की थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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