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नहीं दिखेगी दो बेगमों की लड़ाई! खालिदा जिया के निधन से किस ओर जाएगा बांग्लादेश का चुनाव?

Khaleda Zia Death: बांग्लादेश की पूर्व पीएम और बीएनपी अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनाव से पहले उनका जाना राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया है.

Khaleda Zia Death: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया का मंगलवार सुबह 30 दिसंबर को ढाका के एवरकेयर अस्पताल में निधन हो गया. वह 80 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमारियों से जूझ रही थीं. उनकी पार्टी ने बयान जारी कर बताया कि सुबह 6 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. खालिदा जिया का जाना बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया है, खासकर तब जब फरवरी 2026 में आम चुनाव होने जा रहे हैं.

चुनावी समीकरण पर असर

शेख हसीना के तख्तापलट के बाद यह पहला चुनाव होगा जिसमें दशकों से चली आ रही दो बेगमों की लड़ाई नहीं दिखेगी. कई लोगों का मानना था कि खालिदा जिया अगले साल चुनाव जीतकर एक बार फिर देश का नेतृत्व करेंगी. अब सवाल उठ रहा है कि उनके निधन से चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ेगा?

बेटे तारिक रहमान की वापसी

खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे हैं. उनकी वापसी को पार्टी के लिए टर्निंग प्वाइंट माना जा रहा था. अब मां के निधन के बाद उनके पक्ष में सहानुभूति वोट आने की संभावना जताई जा रही है. तारिक ने आते ही पार्टी में नई ऊर्जा भर दी है और अब नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हीं पर होगी.

बोगरा-7 सीट का महत्व

खालिदा जिया 36 दिनों से अस्पताल में थीं. उन्होंने 29 दिसंबर को बोगरा-7 सीट से नामांकन दाखिल किया था. यह सीट बीएनपी के लिए ऐतिहासिक रही है क्योंकि पार्टी संस्थापक जियाउर रहमान का घर यही था. खालिदा ने 1991, 1996 और 2001 में यहां जीत दर्ज की थी. वहीं तारिक रहमान बोगरा-6 और ढाका-17 से चुनाव लड़ने वाले हैं.

अवामी लीग बैन

शेख हसीना की अवामी लीग इस बार चुनाव में बैन है. भारत के लिए यह स्थिति अहम है क्योंकि बीएनपी की जीत से रिश्तों में स्थिरता आ सकती है. तारिक रहमान ने वापसी के बाद कहा कि वह ऐसा बांग्लादेश बनाना चाहते हैं जहां सभी धर्मों के लोग सुरक्षित हों. दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी हमेशा से कट्टरपंथी विचारधारा के साथ आगे बढ़ता रहा है. यूनुस की अंतरिम सरकार में जमात से बैन हटने के बाद हिंसा बढ़ी थी.

छात्र आंदोलन से जमात तक का सफर

हसीना सरकार गिराने में छात्र आंदोलन का बड़ा योगदान रहा. युवाओं ने मिलकर नेशनल सिटीजन पार्टी बनाई और जमात से हाथ मिला लिया. इस बीच इकबाल मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या ने कट्टरपंथी विचारधारा को और मजबूत किया है.

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चुनावी माहौल पर सबकी नजर

अब सबकी नजर 12 फरवरी को होने वाले चुनाव पर है. अगले 40 दिनों में कैसा माहौल बनता है, यह तय करेगा कि खालिदा जिया के निधन के बाद बांग्लादेश की राजनीति किस दिशा में जाएगी.

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-भारत एक्सप्रेस



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