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‘विदेशी हाथ’ की छाया: इंदिरा गांधी से मादुरो तक का ऐतिहासिक पैटर्न

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की निर्णायक जीत के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर थी. लेकिन 1973 में चिली में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए समाजवादी राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे की हत्या और जनरल ऑगस्टो पिनोशे के सैन्य तख्तापलट ने इंदिरा के मन में गहरा डर पैदा कर दिया.

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

विश्व की नजरें न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट पर टिकी हुई थीं, जहां वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अमेरिकी अधिकारियों के सामने पेश किया गया. मादुरो ने अदालत में स्पष्ट शब्दों में कहा—“मैं अपहृत हूं. मैं निर्दोष हूं. मैं अभी भी राष्ट्रपति हूं.” यह घटना किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लग रही थी—अमेरिकी सेना द्वारा काराकास पर हमला, राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर न्यूयॉर्क लाना, और ड्रग तस्करी के आरोपों में मुकदमा. वेनेजुएला सरकार और उनके समर्थक इसे ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद’ का स्पष्ट उदाहरण बता रहे हैं.

यह घटना आश्चर्यजनक रूप से उस ‘विदेशी हाथ’ की याद दिलाती है, जिसकी आशंका भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1970 के दशक में सताती रहती थी. प्रसिद्ध पत्रकार सुगाता श्रीनिवासराजू ने हाल ही में अपने लेख में इस समानता को रेखांकित किया है. इंदिरा गांधी को लगता था कि अमेरिका (विशेषकर CIA) उनके खिलाफ साजिश रच रहा है, ठीक वैसे ही जैसे वे सल्वाडोर अलेंदे के साथ 1973 में चिली में कर चुके थे.

‘विदेशी हाथ’ वाली आशंकाएं

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की निर्णायक जीत के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर थी. लेकिन 1973 में चिली में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए समाजवादी राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे की हत्या और जनरल ऑगस्टो पिनोशे के सैन्य तख्तापलट ने इंदिरा के मन में गहरा डर पैदा कर दिया. अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के साथ उनके संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे. इंदिरा को लगता था कि अमेरिका गरीब, गैर-संरेखित देशों में ऐसे नेताओं को बर्दाश्त नहीं करता जो सोवियत संघ के करीब हों या जो अमेरिकी हितों के खिलाफ खड़े हों.

इंदिरा के नजदीकी सहयोगी और सलाहकारों ने उन्हें बताया कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन (जो 1974-75 में चरम पर था) के पीछे अमेरिकी धन और समर्थन हो सकता है. इंदिरा ने इसे ‘विदेशी हाथ’ कहा. उनकी जीवनीकारों और समकालीन दस्तावेजों में दर्ज है कि वे अलेंदे की तरह ‘हटाए जाने’ के डर से ग्रस्त थीं. इसी आशंका ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा का आधार दिया. सुगाता श्रीनिवासराजू लिखते हैं कि इंदिरा ने यहां तक सोचा कि अमेरिका बांग्लादेश के शेख मुजीबुर रहमान की हत्या (1975) जैसा कुछ भारत में दोहरा सकता है.

किसिंजर ने बाद में अपनी किताब में लिखा कि अमेरिका ने भारत को ‘न्यूट्रल आर्बिटर’ माना, लेकिन इंदिरा को लगता था कि यह सब एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. नोम चॉम्स्की जैसे विचारकों ने भी अमेरिकी विदेश नीति को ‘साम्राज्यवादी’ बताया, जो विकासशील देशों में लोकतांत्रिक नेताओं को उखाड़ फेंकने में विश्वास रखती है.

मादुरो की घटना: एक नया अध्याय?

जनवरी 2026 में जो हुआ, वह इंदिरा की आशंकाओं को एक तरह से साकार करता प्रतीत होता है. अमेरिकी प्रशासन (ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में) ने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई की, मादुरो को ‘अपहरण’ कर लिया, और उन्हें ड्रग तस्करी के आरोप में न्यूयॉर्क की अदालत में पेश किया. मादुरो और उनकी पत्नी ने दावा किया कि यह ‘अवैध सैन्य अपहरण’ है. वेनेजुएला के अंतरिम नेतृत्व ने इसे ‘अमेरिकी आक्रमण’ बताया.

मादुरो लंबे समय से अमेरिका पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह विपक्षी ताकतों के जरिए उन्हें हटाना चाहता है—ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा ने 1970 के दशक में सोचा था. दोनों नेताओं की विचारधारा (समाजवादी/वामपंथी) और अमेरिका-विरोधी रुख समान है. दोनों ने ‘विदेशी हस्तक्षेप’ को अपनी सत्ता बचाने का बहाना भी बनाया.

क्या यह पैटर्न आज भी जारी है?

इंदिरा गांधी की आशंका पूरी तरह निराधार नहीं थी—चिली, ग्वाटेमाला, ईरान (1953) जैसे कई उदाहरण हैं जहां CIA की भूमिका सिद्ध हुई है. लेकिन भारत में आपातकाल को ज्यादातर घरेलू राजनीतिक संकट (अदालती फैसला, जेपी आंदोलन) से जोड़ा जाता है, न कि विदेशी साजिश से.

मादुरो के मामले में भी सवाल हैं. क्या यह वाकई ‘अपहरण’ था या अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कार्रवाई? अमेरिका ने इसे ड्रग्स और तेल हितों से जोड़ा है. लेकिन विकासशील देशों के कई नेता इसे ‘नव-साम्राज्यवाद’ मानते हैं.

इतिहास हमें सिखाता है कि सत्ता और भय अक्सर साथ चलते हैं. जब कोई नेता लगातार चुनौतियों का सामना करता है, तो ‘विदेशी हाथ’ का सिद्धांत सुविधाजनक हो जाता है—चाहे वह 1975 का भारत हो या 2026 का वेनेजुएला. सवाल यह है कि क्या हर बार यह सिर्फ भय होती होती हैं, या कभी-कभी वास्तविक खतरा?

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-भारत एक्सप्रेस



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