Middle East Conflict Impact: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर सिर्फ तेल और भू-राजनीति पर ही नहीं पड़ रहा है, बल्कि ग्लोबल फूड सप्लाई चेन में भी एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. एक तरफ जंग के बादल छाए हैं, वहीं दूसरी तरफ भारतीय पोल्ट्री (मुर्गी और अंडे) कारोबारियों के लिए सच में ‘कुबेर का खजाना’ खुल गया है. खाड़ी देशों की थाली में अब तुर्किये (टर्की) और ईरान के बजाय भारतीय अंडों और चिकन का दबदबा बढ़ता जा रहा है. आइए, इस पूरे कारोबारी समीकरण और भारत के पोल्ट्री उद्योग की इस ‘सुनहरी उड़ान’ को डिकोड करते हैं.
‘ऑल इंडिया पोल्ट्री एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन’ का मानना है कि अगर ब्राजील और टर्की की सप्लाई में जरा भी रुकावट आती है, तो भारत को इस खाली जगह को भरने में बड़ी मदद मिलेगी. गर्मियों की शुरुआत के साथ देश में अंडों के दाम गिर रहे हैं, जिससे विदेशी बाजारों में हमारे उत्पाद और भी सस्ते और प्रतिस्पर्धी हो गए हैं. इसका सीधा मतलब है कि खाड़ी देशों की बढ़ती डिमांड अब भारतीय कारोबारियों की जेबें भरने वाली है.
आंकड़ों में ‘बल्ले-बल्ले’
भारत का पोल्ट्री निर्यात इस संकट काल में रॉकेट की रफ्तार से बढ़ा है. वाणिज्यिक खुफिया और सांख्यिकी महानिदेशालय के डेटा इस बात की तस्दीक करते हैं. 2025-26 के पहले 9 महीने में 237 मिलियन डॉलर का रिकॉर्ड निर्यात हुआ है. पिछले साल इस अवधि में यह आंकड़ा महज 119 मिलियन डॉलर था. यह 100% का सीधा उछाल है, जो साबित करता है कि भारतीय पोल्ट्री उद्योग इस मौके को पूरी तरह भुना रहा है.
कौन इन, कौन आउट?
तुर्किये (टर्की)/ईरान बड़े निर्यातक देश हैं. लेकिन, युद्ध और क्षेत्रीय तनाव के कारण सप्लाई चेन चरमरा सकती है. इससे मार्केट में अंडों और पोल्ट्री की भारी किल्लत पैदा हो जाएगी. ब्राजील इसके बाद ब्राजील का नंबर आता है. लेकिन, लंबी दूरी और लाल सागर संकट के कारण लॉजिस्टिक समस्याओं का खतरा मंडरा रहा है. सप्लाई में संभावित रुकावट भारत के लिए और भी बड़े रास्ते खोल रही है. भारत में बंपर घरेलू उत्पादन, सस्ती कीमतें और खाड़ी देशों से भौगोलिक निकटता है. यही कारण मार्केट शेयर में जबरदस्त उछाल दे सकता है. ऐसे में भारत इस क्षेत्र का नया पोल्ट्री ‘किंग’ बन रहा है.
भारतीय पोल्ट्री की सफलता के 3 बड़े कारण
अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े इस महायुद्ध ने खाड़ी देशों के सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है. लेकिन भारतीय पोल्ट्री उद्योग के लिए यह संकट एक ‘जैकपॉट’ साबित हो सकता है. वाणिज्यिक खुफिया और सांख्यिकी महानिदेशालय के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती 9 महीनों में ही भारत का पोल्ट्री निर्यात दोगुना होकर 237 मिलियन डॉलर के पार पहुँच गया है, जो पिछले साल महज 119 मिलियन डॉलर था.
- प्रतिद्वंदियों का बाहर होना: ईरान और तुर्की जैसे पारंपरिक प्रतिद्वंदियों की सप्लाई कटने से भारतीय निर्यातकों के लिए मैदान पूरी तरह साफ हो गया है.
- घरेलू बाजार में गिरती कीमतें: भारत में गर्मियों की दस्तक के साथ अंडों के दाम गिर रहे हैं. इससे विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पाद और भी सस्ते, आकर्षक और प्रतिस्पर्धी हो गए हैं.
- सुरक्षित बाजार: ओमान और UAE जैसे सुरक्षित और बड़े बाजारों में भारत की पकड़ पहले से मजबूत है, जो अब और भी गहरी हो रही है.
पश्चिम एशियाई बाजारों (UAE, ओमान, सऊदी अरब) में भारत का सीधा मुकाबला ईरान और तुर्की से होता है. जंग के कारण इन दोनों देशों की सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई है. ऑल इंडिया पोल्ट्री एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार, अगर ईरान और तुर्की की सप्लाई कटती है, तो खाड़ी देशों की डिमांड पूरी करने वाला भारत इकलौता बड़ा खिलाड़ी बचेगा. ऊपर से भारत में गर्मियों की आहट के साथ अंडों के दाम गिर रहे हैं, जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पाद और भी सस्ते और आकर्षक हो गए हैं.
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क्या भारत पर कोई नकारात्मक असर पड़ेगा?
जब निर्यात तेजी से बढ़ता है, तो अक्सर घरेलू बाजार में किल्लत या महंगाई का डर सताता है. लेकिन भारत का पोल्ट्री उद्योग करीब 30 बिलियन डॉलर का एक विशाल और परिपक्व सेक्टर है, जो सालाना 7 से 8 प्रतिशत की स्थिर दर से बढ़ रहा है. सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि आगामी रमजान सीजन के लिए विदेशी डिमांड की ज्यादातर खेप पहले ही भेजी जा चुकी है. इसलिए, बंपर निर्यात के बावजूद भारत के घरेलू बाजार में अंडों या चिकन की कोई कमी नहीं होने वाली है. यह भारत के लिए शुद्ध रूप से फायदे का सौदा है.
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