Neelkanth Varni statue Akshardham Delhi: स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में गुरुवार को स्थापित हुई 108 फीट ऊंची प्रतिमा ने एक बार फिर उस महान व्यक्तित्व की याद ताजा कर दी है, जिन्हें इतिहास ‘नीलकंठ वर्णी’ के नाम से जानता है. नीलकंठ वर्णी दरअसल भगवान स्वामीनारायण का वह बाल स्वरूप है, जिन्होंने मात्र 11 वर्ष की कोमल आयु में सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया था.
29 जून 1792 को अयोध्या के पास छपिया से शुरू हुई उनकी यह यात्रा भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की सबसे कठिन यात्राओं में से एक मानी जाती है. उन्होंने नंगे पैर, केवल एक लंगोटी और हाथ में एक कमंडल लेकर पूरे भारत की लगभग 12,000 किलोमीटर की पदयात्रा की थी. अक्षरधाम में स्थापित यह प्रतिमा उनके उसी ‘तपस्वी’ रूप को समर्पित है, जो शांति और संयम का वैश्विक प्रतीक बन गया है.
‘एक पैर’ पर तपस्या का क्या है रहस्य?
अक्षरधाम में नीलकंठ वर्णी को एक पैर पर खड़े होकर ध्यान मुद्रा में दिखाया गया है, इसके पीछे उनकी कठोर साधना का एक गहरा अध्याय छिपा है. अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने नेपाल के मुक्तिनाथ के बर्फीले पहाड़ों में, कड़ाके की ठंड के बीच केवल एक पैर पर खड़े होकर ‘सूर्य साधना’ की थी. उन्होंने महीनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए केवल योग और ध्यान के बल पर खुद को सिद्ध किया. उनकी इस मुद्रा को ‘अष्टांग योग’ की पराकाष्ठा माना जाता है.
108 फीट ऊंची यह प्रतिमा दुनिया को यही संदेश देती है कि संकल्प की शक्ति से एक बालक भी प्रकृति की कठिनतम चुनौतियों को जीत सकता है. आज इसी त्याग को सम्मान देने के लिए महंत स्वामी महाराज ने इस विशालकाय प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की है.
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ युद्ध
नीलकंठ वर्णी की यात्रा केवल व्यक्तिगत मोक्ष के लिए नहीं थी बल्कि उन्होंने अपनी पदयात्रा के दौरान समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वास और जातिवाद के खिलाफ अलख जगाई. हिमालय की गुफाओं से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम तक, उन्होंने जहाँ भी कदम रखे, वहां लोगों को ‘अहिंसा’ और ‘सदाचार’ का मार्ग दिखाया.
उन्होंने नशीले पदार्थों के सेवन और पशु बलि जैसी प्रथाओं को बंद करने के लिए बड़े आंदोलन किए. 108 फीट की यह प्रतिमा उन्हीं नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती है. अक्षरधाम प्रशासन का मानना है कि यह मूर्ति आने वाले समय में युवाओं के लिए अनुशासन और चरित्र निर्माण की सबसे बड़ी प्रेरणा बनेगी.
नीलकंठ वर्णी से भगवान स्वामीनारायण बनने का सफर
सात वर्षों की निरंतर यात्रा के बाद जब नीलकंठ वर्णी गुजरात के लोज गांव पहुँचे, तो वहां उनकी मुलाकात रामानंद स्वामी से हुई. उनकी विद्वत्ता और तपस्या से प्रभावित होकर रामानंद स्वामी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुना और उन्हें ‘सहजानंद स्वामी’ का नाम दिया, जिन्हें बाद में दुनिया ने भगवान स्वामीनारायण के रूप में पूजा.
अक्षरधाम में इस प्रतिमा की स्थापना के साथ ही अब दिल्ली के पर्यटन मानचित्र पर एक नया आध्यात्मिक लैंडमार्क जुड़ गया है. 300 संतों और हजारों स्वयंसेवकों की मौजूदगी में हुआ यह उद्घाटन समारोह यह साबित करता है कि नीलकंठ वर्णी का संदेश आज के आधुनिक युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 200 साल पहले था.
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-भारत एक्सप्रेस
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