Bharat Express DD Free Dish
Pension Mission Shakti Digital
Pension Mission Shakti Digital

‘हिंदी और उर्दू में सिर्फ लिपि का फर्क…’, Bharat Express के कॉन्क्लेव ‘बज्म-ए-सहाफ़त’ में ग्रुप मैनेजिंग एडिटर राधेश्याम राय की स्पीच

दिल्ली में भारत एक्सप्रेस के ‘बज्म-ए-सहाफ़त’ कॉन्क्लेव में ग्रुप मैनेजिंग एडिटर राधेश्याम राय ने भाषा की साझी विरासत, उर्दू पत्रकारिता के इतिहास और भाषाई शुद्धिकरण पर विचार रखे. गंगा-जमुनी तहजीब की साझी संस्कृति और पत्रकारिता के दायित्वों पर केंद्रित उनका संबोधन साहित्यिक मिठास और वैचारिक परिपक्वता से ओत-प्रोत रहा.

दिल्ली: उर्दू कॉन्क्लेव में भारत एक्सप्रेस के ग्रुप मैनेजिंग एडिटर राधेश्याम राय

राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) के मल्टीपर्पज हॉल में आज ‘भारत एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क’ की उर्दू विंग द्वारा ‘बज्म-ए-सहाफ़त’ (Bazm-e-Sahafat) कॉन्क्लेव आयोजित किया गया. “नये भारत की बात, उर्दू के साथ” थीम पर आयोजित इस एकदिवसीय विमर्श में राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता जगत के मूर्धन्य हस्ताक्षर जुटे. कार्यक्रम के विशिष्ट सत्र को संबोधित करते हुए भारत एक्सप्रेस के ग्रुप मैनेजिंग एडिटर, जाने-माने पत्रकार और भाषा-साहित्य के मर्मज्ञ राधेश्याम राय ने अपने विचार रखे. अदब, इतिहास, साझी संस्कृति और पत्रकारिता के दायित्वों पर केंद्रित उनका संबोधन साहित्यिक मिठास और वैचारिक परिपक्वता से ओत-प्रोत रहा.

“मैं अदब और सहाफ़त का अदना विद्यार्थी”

मंच से अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए राधेश्याम राय ने विनम्र भाव से कहा:

“मंच पर उपस्थित जेएनयू के मेरे सहपाठी रहे इकबाल साहब और तमाम प्रबुद्धजनों का वंदन. मैं तो स्वयं को अदब और पत्रकारिता का विद्यार्थी मानता हूँ, जहाँ हर रोज़ आप जैसे गुणीजनों से कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है.”

उन्होंने भारत एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क के चेयरमैन, सीएमडी एवं एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय की ओर से सभी गणमान्य अतिथियों का आभार जताया और रेखांकित किया कि भारत एक्सप्रेस के शुभारंभ के बाद यह तीसरा बड़ा आयोजन है. उन्होंने केंद्र सरकार तथा दिल्ली सरकार के अनवरत सहयोग के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और दिन-रात एक कर इस आयोजन को भव्य स्वरूप देने वाली भारत एक्सप्रेस की उर्दू टीम की भूरि-भूरि प्रशंसा की.

चुनौतियों से नया रास्ता गढ़ती पत्रकारिता

उर्दू सहाफ़त की मौजूदा स्थिति पर चर्चा करते हुए राधेश्याम राय ने कहा कि अक्सर बौद्धिक मंचों पर उर्दू भाषा और पत्रकारिता के समक्ष खड़ी चुनौतियों की दुहाई दी जाती है. उन्होंने साफ़ किया कि चुनौतियाँ केवल उर्दू के सामने नहीं हैं; आज अख़बार चाहे हिंदी का हो या उर्दू का, या फिर टेलीविज़न मीडिया ही क्यों न हो—पूरा मीडिया जगत संक्रमण और बदलाव के दौर से गुज़र रहा है.

उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा:

“मीडिया का स्वभाव ही यही है कि वह चुनौतियों से जूझते हुए अपना नया रास्ता खुद तलाश लेता है. भारत एक्सप्रेस की उर्दू टीम जिस लगन और गुणवत्ता के साथ नित नए प्रयोग और स्तरीय कंटेंट तैयार कर रही है, वह यह साफ़ संकेत है कि आने वाले समय में उर्दू पत्रकारिता के फलक पर हमारी टीम एक नया इतिहास रचेगी.”

पीएम नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की बधाई

राधेश्याम राय ने मंच से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके 76वें जन्मदिवस पर शुभकामनाएं प्रेषित कीं. उन्होंने कहा कि भारत एक्सप्रेस परिवार और चेयरमैन उपेंद्र राय की ओर से वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि प्रधानमंत्री के सुयोग्य नेतृत्व में राष्ट्र निरंतर विकास, प्रगति और वैश्विक समृद्धि की नई ऊँचाइयों को छुए.

“सिर्फ लिपि अलग है, रूह एक”: JNU के दिनों की स्मृतियां

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में अपने अध्ययन के दिनों को याद करते हुए राधेश्याम राय ने भाषाई एकता का मर्म समझाया. उन्होंने बताया कि जेएनयू में हिंदी और उर्दू का एक ही सम्मिलित विभाग था, जहाँ दोनों भाषाओं के विद्वान मिलकर मार्गदर्शन करते थे.

उन्होंने गुरुओं की उस सीख का उल्लेख किया कि हिंदी और उर्दू में बुनियादी तौर पर सिर्फ लिपि का फ़र्क है— एक तरफ देवनागरी है तो दूसरी तरफ नस्तलीक़.

भाषा के तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ के प्रयासों पर उन्होंने अपने छात्र जीवन के एक बेहद रोचक प्रसंग के ज़रिए तार्किक चोट की. उन्होंने कहा:

“छात्र जीवन में अक्सर नारे गूँजते थे — ‘छात्र हितों का हनन हुआ तो खून बहेगा सड़कों पर!’ अब ज़रा सोचिए, यदि कोई हठधर्मिता के साथ इसमें से उर्दू-फ़ारसी के अल्फाज़ निकाल कर शुद्धिकरण करने लगे, तो यह नारा क्या रूप लेगा? क्या हम ऐसा कहेंगे कि— ‘विद्यार्थियों के कल्याण को बाधित किया गया तो राजमार्गों पर रक्त प्रवाहित होगा’? इस तरह की क्लिष्ट और कृत्रिम भाषा से जनमानस का क्या सरोकार? यह हमारे सहज जीवन और बोलचाल से कहीं मेल नहीं खाती.”

उन्होंने दो-टूक कहा कि भाषा का प्रवाह नदी की तरह सहज और स्वाभाविक होना चाहिए. भारत की जो गंगा-जमुनी तहज़ीब और साझी संस्कृति है, उसमें हिंदी और उर्दू एक-दूसरे की पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं.

आज़ादी की लड़ाई और राष्ट्र निर्माण में उर्दू का योगदान

राधेश्याम राय ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए आज़ादी के आंदोलन में उर्दू के क्रांतिकारी योगदान को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि आज जब राष्ट्र निर्माण की बात होती है, तो यह समझना होगा कि राष्ट्र सिर्फ ईंट-गारे, पत्थरों या कंक्रीट की इमारतों से नहीं बनता; राष्ट्र अपने नागरिकों की तहज़ीब, उनकी जीवनशैली और साझे संस्कारों से बनता है.

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा:

‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’: यह अमर नारा हसरत मोहानी ने दिया था. यदि इसका शाब्दिक अनुवाद ‘क्रांति अमर रहे’ किया जाता, तो शायद वह जन-आंदोलन का वह स्वाभाविक घोष न बन पाता जो आज हर विचारधारा के युवा और बुजुर्ग की ज़ुबान पर चढ़ा रहता है.

‘सरफ़रोशी की तमन्ना’: जिसे अमर बलिदानी राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आवाज़ और शहादत से अमर कर दिया, उस कालजयी रचना को अज़ीमाबाद (पटना) के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी ने अपनी क़लम से तराशा था.

सहाफ़त की पहली शहादत: भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के पहले शहीद मौलवी मुहम्मद बाक़र थे, जिन्हें 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ लिखने के जुर्म में तोप के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया था.

उसी दौर की नब्ज़ पकड़ते हुए उन्होंने अकबर इलाहाबादी के मशहूर शेर को दोहराया:

“खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो.”


उन्होंने कहा कि यह शेर आज भी हमें याद दिलाता है कि कलम की ताकत हथियारों की बर्बरता पर हमेशा भारी पड़ती है.

AI के तकनीकी दौर में साझी विरासत का संकल्प

अपने संबोधन के अंतिम पड़ाव पर राधेश्याम राय ने समकालीन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दौर का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि आज जब ‘ओपनएआई’ (OpenAI) और ‘एंथ्रोपिक’ (Anthropic) जैसी वैश्विक तकनीकी कम्पनियाँ इंसानी बुद्धिमत्ता को चुनौती देने में लगी हैं, उस दौर में भी ज़ुबान की मिठास और इंसानी जज़्बात की कोई काट नहीं है.

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि आज भी उर्दू के कई अल्फाज़ ऐसे हैं जिनका कोई मुकम्मल हिंदी विकल्प नहीं बन सका. उन्होंने मशहूर फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म का ज़िक्र करते हुए कहा कि अकबर के संवादों में प्रयुक्त ‘मा-बदौलत’ जैसे लफ़्ज़ों का कोई कृत्रिम अनुवाद नहीं किया जा सकता.

संबोधन के समापन में उन्‍होंने स्पष्ट संदेश दिया:

“उर्दू और फ़ारसी के शब्दों को बाहर कर भाषा के शुद्धिकरण का कोई भी प्रयोग पूरी तरह बेमानी है. उर्दू ने हिंदी को तराशा और समृद्ध किया है, तो हिंदी ने उर्दू को गले लगाकर विशालता दी है. यह हमारी अटूट साझी विरासत और तहज़ीब है. भारत एक्सप्रेस इसी सौहार्द और साझा विचार की मशाल लेकर आगे बढ़ रहा है और आगे भी बढ़ता रहेगा.”

तस्‍वीरों में झलकियां


radheshyam rai bharat express urdu-conclave

कॉन्क्लेव का पूरा वीडियो देखिए –

ये भी पढ़िए: ‘उपेंद्र राय हैं उर्दू के सबसे बड़े दोस्त’, Bazm-e-Sahafat में शाहनवाज हुसैन ने दिल खोलकर दी बधाई



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Pension Mission Shakti Digital

Latest