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CEC ज्ञानेश कुमार को बड़ी राहत! राज्यसभा सभापति ने महाभियोग प्रस्ताव किया खारिज

CEC Gyanesh Kumar Impeachment: मुख्य चुनाव आयुक्त का पद देश की चुनावी व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, और इस पद के खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए कड़े संवैधानिक प्रावधानों को पूरा करना आवश्यक होता है. संसदीय नियमों के अनुसार, ऐसी किसी भी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए सभापति की मंजूरी जरूरी होती है और इसी चरण में इस नोटिस को रोक दिया गया.

CEC Gyanesh Kumar Impeachment

CEC Gyanesh Kumar Impeachment: राज्यसभा के सभापति ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. इसके साथ ही इस मामले पर आगे कोई संसदीय कार्रवाई नहीं होगी.

63 सदस्यों ने दाखिल किया था औपचारिक नोटिस

संसदीय बुलेटिन के अनुसार, 12 मार्च 2026 को राज्यसभा के 63 सदस्यों ने एक औपचारिक नोटिस दाखिल किया था. यह नोटिस भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324(5) और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(4) के तहत प्रस्तुत किया गया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी.

इसके अलावा, नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 और जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट 1968 का भी हवाला दिया गया था, जो ऐसे मामलों में कानूनी आधार प्रदान करते हैं.

राज्यसभा सभापति का निर्णय

राज्यसभा के सभापति ने इस नोटिस की विस्तृत समीक्षा के बाद इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. संसदीय बुलेटिन में कहा गया है कि सभी संबंधित पहलुओं का सावधानीपूर्वक और निष्पक्ष परीक्षण किया गया, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया.

सभापति ने जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट 1968 की धारा 3 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए इस प्रस्ताव को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया. इस फैसले के बाद न तो इस पर कोई चर्चा होगी और न ही किसी तरह की औपचारिक जांच शुरू की जा सकेगी.

संवैधानिक और राजनीतिक महत्व

मुख्य चुनाव आयुक्त का पद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम स्तंभ है. इस पद के खिलाफ कार्रवाई के लिए कठोर संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित की गई है.

संसदीय नियमों के मुताबिक, ऐसे किसी भी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए सभापति की मंजूरी अनिवार्य होती है और इसी स्तर पर इस प्रस्ताव को रोक दिया गया.

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संसदीय बुलेटिन के जरिये दी गई जानकारी

संसदीय बुलेटिन पर राज्यसभा के महासचिव पी.सी. मोदी के हस्ताक्षर मौजूद हैं, जिसके जरिए सदस्यों को इस निर्णय की औपचारिक जानकारी दी गई.

यह घटनाक्रम देश की चुनावी व्यवस्था और संसदीय प्रक्रियाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है.

-भारत एक्सप्रेस



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