टेरर फंडिंग मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक को फांसी की सजा देने की मांग वाली एनआईए की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट अब 21 जुलाई 2026 को सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान यासीन मलिक की ओर से दाखिल हलफनामे के बाद एनआईए ने भी अपना जवाब दाखिल किया है. कोर्ट ने एनआईए के जवाब की कॉपी यासीन मलिक को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है.
यासीन मलिक की व्यक्तिगत बहस
पिछली सुनवाई के दौरान यासीन मलिक तिहाड़ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुआ था. उसने कहा था कि एनआईए द्वारा मौत की सजा के लिए अपील दायर किए तीन साल हो गए हैं और किसी व्यक्ति को इस तरह असमंजस में रखना कि उसे मौत की सजा मिलेगी या नहीं, एक मानसिक यातना है. यासीन मलिक ने दिल्ली हाई कोर्ट को यह भी बताया था कि वह इस मामले में किसी वकील के माध्यम से नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से खुद बहस करना चाहता है. कोर्ट ने उसे केस से जुड़े कानूनों और दस्तावेजों पर जवाब दाखिल करने के लिए सोचने का समय दिया था.
एनआईए की दलील
एनआईए की याचिका में कहा गया था कि ओसामा बिन लादेन की तर्ज पर यासीन मलिक को भी फांसी की सजा होनी चाहिए. एनआईए की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि यासीन मलिक ने फांसी की सजा से बचने के लिए बड़ी चालाकी से अपना अपराध कबूल कर लिया था, जिसके बाद अदालत ने उसे आजीवन कारावास सुना दिया. उन्होंने तर्क दिया कि उसके खिलाफ ऐसे अपराध हैं जिसके तहत फांसी होनी चाहिए, वरना कोई भी आतंकवादी वारदात कर गुनाह कबूल कर लेगा और फांसी से बच जाएगा.
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केस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इससे पहले 11 जुलाई को हाई कोर्ट के जज जस्टिस अमित शर्मा ने मामले से खुद को अलग कर लिया था, क्योंकि वे 2010 में एनआईए की तरफ से बतौर अभियोजक पेश हो चुके थे. इसके बाद मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया था. बता दें कि 25 मई 2022 को पटियाला हाउस कोर्ट ने हत्या और टेरर फंडिंग के मामले में यासीन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. कोर्ट ने उस पर यूएपीए (UAPA) की धारा 17 के तहत सजा और 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. यासीन मलिक ने 10 मई 2022 को अपना गुनाह कबूल किया था.
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