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आखिर क्यों मनाया जाता है मदर्स डे? जानें उस बेटी की कहानी जिसने मां के सम्मान के लिए लड़ी लंबी कानूनी लड़ाई

आज 10 मई को दुनिया भर में मदर्स डे मनाया जा रहा है. गिफ्ट्स और ऑफर्स के शोर के बीच इस दिन का इतिहास बेहद भावुक है. अन्ना जार्विस ने अपनी मां की याद में इसकी शुरुआत की थी, लेकिन बाजारवाद ने उन्हें इस दिन का विरोधी बना दिया.

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आज 10 मई है और सोशल मीडिया से लेकर बाजारों तक हर जगह ‘Mothers Day’ की धूम है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर साल मई के दूसरे रविवार को ही यह दिन क्यों मनाया जाता है? इस खास दिन की शुरुआत किसी कंपनी के विज्ञापन से नहीं, बल्कि एक बेटी की अपनी मां के प्रति सच्ची श्रद्धा और एक बड़े संघर्ष से हुई थी. आइए जानते हैं मदर्स डे का पूरा इतिहास और इसके पीछे का भावुक पहलू.

आखिर क्यों और कब शुरू हुआ Mothers Day?

मदर्स डे की कहानी शुरू होती है साल 1905 में. अमेरिका की रहने वाली अन्ना जार्विस अपनी मां ‘ऐन रीव्स जार्विस’ से बेहद प्यार करती थीं. उनकी मां कोई साधारण महिला नहीं थी उन्होंने अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान ‘मदर्स डे वर्क क्लब’ बनाया था और घायल सैनिकों की निस्वार्थ सेवा की थी.

जब 1905 में मां का निधन हुआ, तो अन्ना बुरी तरह टूट गईं. उन्हें लगा कि मांओं के त्याग और उनके बलिदान को दुनिया भूलती जा रही है. उन्होंने कसम खाई कि वह एक ऐसा दिन तय करवा कर रहेंगी, जब पूरी दुनिया अपनी मां के प्रति कृतज्ञता जाहिर करे.

संघर्ष से लेकर सरकारी छुट्टी बनने तक का सफर

अन्ना जार्विस के सालों के संघर्ष और हजारों पत्रों के अभियान के बाद आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई. साल 1908 में उन्होंने वेस्ट वर्जीनिया के एक चर्च में अपनी मां की याद में पहली आधिकारिक सभा आयोजित की, जहां उन्होंने मां के पसंदीदा सफेद ‘कार्नेशन’ फूल बांटे. अन्ना की इसी जिद के आगे झुकते हुए 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने कानून पास कर मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक ‘मदर्स डे’ और नेशनल हॉलिडे घोषित कर दिया.

खुद अन्ना जार्विस बन गईं इस दिन की दुश्मन

यह इस कहानी का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा है. अन्ना चाहती थीं कि यह दिन मां और बच्चों के बीच की शुद्ध भावनाओं का हो. वह चाहती थीं कि बच्चे मां के साथ वक्त बिताएं या उन्हें अपने हाथ से लिखा एक खत दें. लेकिन 1920 आते-आते उन्होंने देखा कि यह तो एक बड़ा व्यापार बन गया है.

कंपनियां महंगे कार्ड, फूल और गिफ्ट बेचने लगीं. अन्ना को यह दिखावा इतना बुरा लगा कि उन्होंने खुद ‘मदर्स डे’ को बंद करवाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. उन्होंने कंपनियों पर मुकदमे किए और यहां तक कहा कि “अगर आप अपनी मां को रेडीमेड कार्ड देते हैं, तो इसका मतलब है कि आप इतने आलसी हैं कि उनके लिए दो शब्द खुद नहीं लिख सकते.”

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भारत में मदर्स डे

भले ही अन्ना ने इसे बंद कराने की कोशिश की लेकिन तब तक यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया था. भारत में भी हम पश्चिमी देशों की तर्ज पर इसे मई के दूसरे रविवार को ही मनाते हैं. आज बाजार में गिफ्ट्स की भरमार है, ई-कॉमर्स साइट्स पर भारी डिस्काउंट है और सोशल मीडिया स्टेटस की लाइन लगी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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