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नलों में पानी नहीं, कुएं पर 500 का फाइन! डिंडौरी पंचायत का वो अजब फरमान जिसने उड़ा दिए ग्रामीणों के होश

मध्य प्रदेश के Dindori जिले के रामगुड़ा गांव में जल संकट के बीच पंचायत ने कुएं पर नहाने और कपड़े धोने पर 500 रुपये जुर्माना लगा दिया है. ग्रामीणों का आरोप है कि करोड़ों की नल-जल योजना फेल हो चुकी है और गांव पानी के लिए तरस रहा है…

भीषण गर्मी के बीच मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले की ग्राम पंचायत रामगुड़ा में जल संकट (Dindori Water Crisis) ने विकराल रूप ले लिया है. लेकिन यहां के जिम्मेदार अधिकारियों और पंचायत ने समाधान निकालने के बजाय ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. पंचायत ने गांव के एकमात्र कुएं पर फरमान जारी कर दिया है कि यदि कोई वहां नहाते या कपड़े धोते पाया गया, तो उस पर 500 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा. कुएं के पास बाकायदा चेतावनी लिखवा दी गई है, जिससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है.

करोड़ों के प्रोजेक्ट बने ‘शोपीस'(Dindori Water Crisis)

गांव में पीएचई (PHE) विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है. केंद्र और राज्य सरकार की करोड़ों की नल-जल योजना यहां कागजों पर तो पहुंच गई, घर-घर नल भी लगा दिए गए, लेकिन हकीकत यह है कि नलों से पानी की एक बूंद नहीं टपकती. विभाग और पंचायत के बीच समन्वय की कमी के कारण यह पूरी योजना ‘सफेद हाथी’ साबित हो रही है. ग्रामीण महिलाओं को मीलों पैदल चलकर पानी ढोना पड़ रहा है, लेकिन विभाग कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है.

खराब पड़े हैंडपंप और दूषित पानी की मार

रामगुड़ा की स्थिति यह है कि गांव के अधिकांश हैंडपंप महीनों से खराब पड़े हैं. शिकायत के बाद भी उन्हें सुधारा नहीं गया. अब जिस एक कुएं से गांव को पानी की सप्लाई की जा रही है, ग्रामीण उसे भी दूषित बता रहे हैं. मजबूरी में लोग उसी पानी का इस्तेमाल पीने के लिए कर रहे हैं. प्रशासन ने व्यवस्था सुधारने की जहमत तो नहीं उठाई, लेकिन ग्रामीणों को कुएं के पास जाने से रोकने के लिए जुर्माने का ‘फरमान’ जरूर सुना दिया.

ग्रामीणों का दर्द: जुर्माना भरें या प्यासे मरें?

गांव की महिलाओं का कहना है कि दूर-दूर तक पानी का कोई स्रोत नहीं है. हैंडपंप खराब हैं और नल-जल योजना सिर्फ दिखावा है. ऐसे में कुआं ही एकमात्र सहारा था, लेकिन अब वहां भी पाबंदी लगा दी गई है. ग्रामीणों का सवाल है कि अगर कुएं का पानी दूषित है तो उसे साफ क्यों नहीं किया जा रहा? और अगर पानी नहीं है तो प्रशासन जुर्माना किस बात का वसूल रहा है? यह फरमान सीधे तौर पर ग्रामीणों के मौलिक अधिकारों का हनन है.

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जिम्मेदार मौन, जल संकट गहराया

इस पूरे मामले में पीएचई विभाग और पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से बच रहे हैं. सवाल यह उठता है कि क्या 500 रुपये का जुर्माना लगाने से गांव की प्यास बुझ जाएगी? करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी अगर जनता बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज है, तो उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती जिन्होंने इस योजना को बर्बाद किया? डिंडौरी का यह मामला अब सोशल मीडिया पर भी सुर्खियों में है.

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-भारत एक्सप्रेस



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