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‘दुनिया की छत’ पर ड्रैगन का खूनी कब्जा! जानें कैसे संगीनों के साये में बदला तिब्बत का इतिहास?

China Tibet Conflict: 1950 में सैन्य आक्रमण और दबावपूर्ण ’17 सूत्री समझौते’ के जरिए चीन ने तिब्बत की स्वतंत्रता को खत्म कर उसे अपना हिस्सा बना लिया. इस घटना के बाद 1959 में हुए विद्रोह ने दलाई लामा को भारत में शरण लेने पर मजबूर किया, जिससे यह मुद्दा आज भी एक अंतरराष्ट्रीय विवाद बना हुआ है.

China Tibet Conflict (Ai image)

China Tibet Conflict (Ai image)

Edited by Shubhra Rai

China Tibet Conflict: तिब्बत, जिसे दुनिया की छत कहा जाता है, अपनी आध्यात्मिक पहचान और बौद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है. 20वीं सदी के मध्य में चीन की विस्तारवादी नीति ने इस स्वतंत्र राष्ट्र के अस्तित्व को हमेशा के लिए बदल दिया.

1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना के बाद, माओ त्से-तुंग की सरकार ने तिब्बत पर अपना दावा मजबूत करना शुरू कर दिया. चीन का तर्क था कि तिब्बत ऐतिहासिक रूप से उसका हिस्सा रहा है, जबकि 1912 से ही 13वें दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह काम कर रहा था, जिसकी अपनी मुद्रा, सेना और विदेश नीति थी.’शांतिपूर्ण मुक्ति’ (Peaceful liberation) के नाम पर चीन ने तिब्बत के स्वायत्त अस्तित्व को समाप्त करने की योजना बनाई (China Tibet Conflict).

चीनी आक्रमण और वैश्विक चुप्पी

अक्टूबर 1950 में यह तनाव सैन्य संघर्ष में बदल गया, जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने चाम्दो क्षेत्र पर हमला कर दिया. आधुनिक हथियारों से लैस विशाल चीनी सेना के सामने छोटी सी तिब्बती सेना टिक नहीं सकी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद की गुहार लगाने के बावजूद, शीत युद्ध के दौर में किसी भी बड़ी शक्ति ने तिब्बत का साथ नहीं दिया, जिससे चीन का रास्ता साफ हो गया.

दबावपूर्ण ’17 सूत्री समझौता’ और स्वायत्तता का अंत

सैन्य हार के बाद, मई 1951 में दबाव के बीच ’17 सूत्री समझौते’ (17 Point Agreement) पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते ने औपचारिक रूप से तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया, हालांकि इसमें तिब्बत की आंतरिक स्वायत्तता और दलाई लामा की धार्मिक भूमिका को बनाए रखने का वादा किया गया था. तिब्बती प्रतिनिधियों ने बाद में आरोप लगाया कि उनसे यह हस्ताक्षर संगीनों के साये में कराए गए थे.

तिब्बती जन-विद्रोह और दलाई लामा का निर्वासन

कब्जे के बाद के वर्षों में चीन ने तिब्बत का तेजी से सैन्यीकरण किया और वहां की संस्कृति को दबाना शुरू कर दिया (China’s occupation of Tibet). इसके परिणामस्वरूप 1959 में एक बड़ा जन-विद्रोह हुआ, जिसे कुचलने के बाद 14वें दलाई लामा (Dalai Lama) को मजबूरन भारत में शरण लेनी पड़ी.

आज भी तिब्बत ‘तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र’ (TAR) के रूप में चीन के नियंत्रण में है, लेकिन निर्वासित तिब्बती समुदाय अपनी सांस्कृतिक आजादी और वास्तविक स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहा है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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