तलाक से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत यह तलाक का एक वैध आधार है. कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी अलग-अलग पेशेवर और भौगोलिक रास्ते चुन लेते हैं और बिना दूरी कम करने की कोई कोशिश किए सालों तक एक दूसरे से अलग रहते हैं तो वैवाहिक ढांचा ही खत्म माना जाता है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह आदेश दिया है.
राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला बरकरार, यौन संबंधों से दूरी भी क्रूरता
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए शादी खत्म करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट ने कई बिंदुओं पर पति के पक्ष में तलाक को मंजूरी दी थी. तलाक मंजूर करने के कारणों में एक महत्वपूर्ण वजह यह भी थी कि पत्नी कई बार पति के साथ संबंध बनाने से मना कर चुकी थी. हाई कोर्ट ने इसे पति के प्रति क्रूरता माना है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत की अदालतों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि यौन संबंधों से दूरी बनाए रखना, गंभीर भावनात्मक तनाव पैदा करता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है.
अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने दी तलाक को मंजूरी
चिकित्सक दंपती की शादी दिसंबर 2007 में हुई थी. पत्नी गुजरात में और पति राजस्थान में सरकारी सेवा में कार्यरत है. सुप्रीम कोर्ट ने न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कहा कि इस जोड़े के बीच वैवाहिक बंधन खत्म किया जाना उचित है क्योंकि यह स्पष्ट था कि यह बंधन पूरी तरह से टूट चुका है और इसके अब पटरी पर आने की संभावना नहीं बची है.
शादी के बाद सिर्फ दो-तीन महीने ही साथ रह पाया था डॉक्टर जोड़ा
बता दें कि दंपती की शादी 5 दिसंबर 2007 को गुजरात के नडियाद में हुई थी. शादी के बाद दोनों केवल दो-तीन महीने ही साथ रह सके और उनकी कोई संतान भी नहीं हुई. पति राजस्थान में डॉक्टर के रूप में कार्यरत था, जबकि पत्नी गुजरात के खेड़ा जिले के नडियाद में स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologist) के रूप में अपनी सरकारी सेवा जारी रखे हुई थी. इसके बाद दोनों के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

