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42 साल बाद हत्या के आरोपी को दिल्ली हाई कोर्ट ने किया बरी, निचली अदालत की उम्रकैद की सजा रद्द

दिल्ली हाई कोर्ट ने 1983 के एक हत्याकांड के मामले में आरोपी मुकेश कुमार को 42 साल बाद बरी कर दिया है. जानिए क्या है पूरा मामला?

Delhi High Court

दिल्ली हाई कोर्ट ने 42 साल बाद हत्या के आरोपी मुकेश कुमार को बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ लगे आरोपों को साबित करने में विफल रहा है, लिहाजा संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है. इसके साथ ही कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए मुकेश कुमार को सभी आरोपों से बरी कर दिया है.

‘मारो साले को’ कहना हत्या के इरादे का संकेत नहीं: हाई कोर्ट

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि “मारो साले को” शब्दों का प्रयोग अपने आप में हत्या के इरादे का संकेत नहीं देता. कोर्ट ने कहा कि इन्हें चोट पहुँचाने के इरादे से भी जोड़ा जा सकता है. यह मामला 1 दिसंबर 1983 का था. अभियोजन पक्ष के अनुसार, डीटीसी (DTC) बस में कुछ युवकों ने दो महिलाओं से छेड़छाड़ की, जिसका विरोध करने पर विनोद कुमार पर चाकू से हमला किया गया, जिनकी अगले दिन मौत हो गई थी.

पुलिस ने इस मामले में बलविंदर सिंह, श्याम लाल, चरणजीत और मुकेश कुमार को आरोपी बनाया था. निचली अदालत ने वर्ष 2004 में मुकेश कुमार को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि मुकेश के खिलाफ आरोप यह था कि उन्होंने बस के पीछे से “मारो साले को” कहकर अन्य आरोपियों को उकसाया था. उनके खिलाफ किसी हथियार या सीधे हमले का आरोप साबित नहीं हुआ.

बयानों के विरोधाभास पर कोर्ट ने उठाए सवाल

हाई कोर्ट ने गवाहों की पहचान प्रक्रिया (Test Identification Parade – TIP) पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं. हाई कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से संदेह पैदा होता है कि आरोपियों को टीआईपी से पहले ही गवाहों ने देख लिया था. ऐसे में टीआईपी में शामिल होने से इनकार करने पर आरोपी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है.

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अदालत ने यह भी कहा कि गवाह और चश्मदीद के बयानों में कई महत्त्वपूर्ण विरोधाभास थे. कुछ गवाहों ने स्वीकार किया कि उन्होंने कथित तौर पर बस के पीछे मौजूद व्यक्ति को देखा ही नहीं था, जबकि बाद में उसी व्यक्ति की पहचान की गई. कोर्ट ने कहा कि इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी मुकेश कुमार को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है और अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह संदेह के घेरे में आ जाता है.



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