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‘द वॉयस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स’ पुस्तक का उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने CJI सूर्यकांत की मौजूदगी में किया विमोचन

BOOK RELEASE: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने पूर्व सीजेआई बी. आर. गवई के भाषणों पर आधारित पुस्तक ‘द वॉयस ऑफ जस्टिस’ का भव्य विमोचन किया.

CP Radhakrishnan
Vijay Ram Edited by Vijay Ram

भारतीय न्यायपालिका और संवैधानिक विमर्श के क्षेत्र में आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा. देश के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने एक भव्य कार्यक्रम के दौरान भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी. आर. गवई द्वारा लिखी और दिए गए संबोधनों पर आधारित पुस्तक ‘द वॉयस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स’ का आधिकारिक विमोचन किया. कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (CLEA) की विशेष पहल पर प्रकाशित की गई इस ऐतिहासिक पुस्तक का संपादन प्रो. (डॉ.) एस. शिवकुमार ने किया है, जबकि इसका प्रकाशन प्रसिद्ध पब्लिशिंग हाउस Thomson Reuters द्वारा किया गया है.

शीर्ष जजों का लगा जमावड़ा, उपराष्ट्रपति की भावुक अपील

इस गरिमामयी विमोचन समारोह में उपराष्ट्रपति मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने की. इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय, पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना सहित शीर्ष अदालत और हाई कोर्ट के कई सेवानिवृत्त जज, वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायिक अधिकारी मौजूद रहे. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कानूनी बिरादरी से एक बेहद भावुक अपील की. उन्होंने देश के वकीलों से आग्रह किया कि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए साल में कम से कम एक केस गरीबों और वंचितों के लिए मुफ्त (प्रो-बोनो) लड़ें.

न्याय की आवाज में तर्क हो, भावनाहीनता नहीं: सीजेआई सूर्यकांत

पुस्तक की प्रस्तावना लिखने वाले सीजेआई सूर्यकांत ने पूर्व सीजेआई गवई को उनके उत्कृष्ट विचारों के संग्रह के लिए बधाई दी. सीजेआई ने कहा, “यह किताब पढ़ना हर कानूनविद के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि न्याय की आवाज में तर्क तो होना चाहिए, लेकिन वह कभी भावनाहीन नहीं होनी चाहिए. वह मजबूत हो, लेकिन अहंकारी नहीं; और मानवीय रहते हुए संवैधानिक भी होनी चाहिए.” उन्होंने आगे कहा कि यह कृति केवल एक साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक नैतिक दिशा-सूचक (Moral Compass) भी है, जो वकीलों, विद्वानों और आम नागरिकों का मार्गदर्शन करेगी. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह पुस्तक देश के सभी लॉ स्कूलों, कोर्ट लाइब्रेरी और युवा वकीलों के चैंबर तक पहुंचेगी.

साढ़े सात वर्षों के न्यायिक सफर का प्रामाणिक रिकॉर्ड

भावुक होते हुए पूर्व सीजेआई बी. आर. गवई ने कहा कि एक जज को आमतौर पर उसके फैसलों से याद किया जाता है, लेकिन यह किताब पिछले साढ़े सात वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के जज और भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर देश-विदेश में दिए गए उनके महत्वपूर्ण भाषणों का एक जीवंत रिकॉर्ड है. वहीं, उनके पुराने मित्र और सहकर्मी जस्टिस विक्रमनाथ ने इसे एक लंबे समय से प्रतीक्षित पुस्तक बताते हुए कहा कि इसमें एक बेहद संवेदनशील और ज्ञानी जज के विचार शामिल हैं.

क्या है इस पुस्तक में खास?

इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य संविधान, कानून के शासन (Rule of Law), सामाजिक न्याय और न्याय तक समान पहुंच जैसे गंभीर विषयों पर पूर्व सीजेआई के दृष्टिकोण को सहेजना है. किताब में निम्नलिखित प्रमुख विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है:

परिवर्तनकारी संवैधानिकता (Transformative Constitutionalism) और बदलते भारत में न्यायपालिका की भूमिका.

मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) और राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के बीच संतुलन.

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) और अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक सहयोग.

यह संकलन विधि के छात्रों, कानूनी शोधकर्ताओं, अधिवक्ताओं और संवैधानिक लोकतंत्र में गहरी रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक बेहद उपयोगी और मार्गदर्शक सामग्री माना जा रहा है.



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