दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में बढ़ रहे अवैध निर्माण और आगजनी (फायर सेफ्टी) की गंभीर घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है. देश की शीर्ष अदालत ने दिल्ली के मालवीय नगर और लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में हाल ही में लगी भीषण आग की घटनाओं का विशेष रूप से जिक्र करते हुए नगर निगमों के ढुलमुल रवैए पर गहरी नाराजगी जताई है.
लापरवाह अफसरों पर भी गिरेगी गाज
माननीय जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने इस मामले में कड़ा आदेश जारी किया है. कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आग की किसी भी दर्दनाक घटना के बाद केवल बिल्डरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की भी जवाबदेही हर हाल में तय होनी चाहिए. अदालत ने चेताया कि यदि ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) के अंतिम आदेशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई नहीं की जाती है, तो संबंधित मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा.
लाजपत नगर, साकेत और लखनऊ के अलीगंज का होगा सर्वे
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों और दो ड्राफ्ट्समैन को मिलाकर एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ टीम का गठन करने का निर्देश दिया है. यह विशेष टीम दिल्ली नगर निगम (MCD) के वरिष्ठ अधिकारियों और न्यायालय द्वारा नियुक्त किए गए एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) के साथ मिलकर दिल्ली के मालवीय नगर, साकेत और लाजपत नगर इलाकों का सघन सर्वे करेगी. इसके साथ ही, इस विशेषज्ञ टीम द्वारा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके का भी विस्तृत भौतिक निरीक्षण किया जाएगा.
कोर्ट ने जताई गहरी चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के गुरुग्राम (गुड़गांव) में फायर सेफ्टी ऑडिट की बदहाल स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की. कोर्ट ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि खबरों के अनुसार गुरुग्राम के लगभग 93 प्रतिशत व्यावसायिक और आवासीय प्रतिष्ठान फायर सेफ्टी (अग्नि सुरक्षा) के तय मानकों पर बिल्कुल खरे नहीं उतर रहे हैं. कोर्ट ने साफ निर्देश दिया कि जिन राज्यों और नगर निकायों ने अवैध निर्माण और फायर ऑडिट को लेकर अब तक अपनी एक्शन टेकन रिपोर्ट (कार्रवाई रिपोर्ट) अदालत में दाखिल नहीं की है, आवश्यक होने पर उनके खिलाफ भी बेहद सख्त कानूनी कदम उठाए जाएंगे.
20 मई 2026 के आदेश की अवहेलना पर कोर्ट नाराज
अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पूर्व में 20 मई 2026 को जारी किए गए आदेश में लाजपत नगर और सरोजनी नगर में धड़ल्ले से चल रहे अवैध निर्माण का स्पष्ट उदाहरण देते हुए कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे. इसके बावजूद, नगर निगम के अधिकारियों ने जमीनी स्तर पर सीलिंग या ध्वस्तीकरण करने के बजाय केवल कागजी नोटिस जारी किए और उसके बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया.
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अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि ऐसे अवैध और कमजोर भवन आम लोगों की जान के लिए सीधा खतरा हैं, क्योंकि तकनीकी रूप से वे अत्यधिक अतिरिक्त भार सहने में सक्षम नहीं हैं. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ाई से जानना चाहा कि इस लापरवाही के लिए दक्षिण दिल्ली के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अब तक क्या विभागीय या कानूनी कार्रवाई की गई है?
अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से तलब
सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम चेतावनी देते हुए कहा कि अगर शीर्ष अदालत के आदेशों का पालन करने में जरा सी भी लापरवाही बरती गई, तो संबंधित दोषी अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कोर्ट की अवमानना (कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट) का मुकदमा चलाया जाएगा. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने एमसीडी (MCD) के उपाध्यक्ष और लखनऊ नगर निगम के आयुक्त (कमिश्नर) को आगामी सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का समन जारी किया है, ताकि वे खुद उपस्थित होकर यह बता सकें कि 20 मई के ऐतिहासिक आदेश के बाद उनके विभागों द्वारा धरातल पर क्या ठोस कार्रवाई की गई है.
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