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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पश्चिम बंगाल के 390 मदरसा कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने पश्चिम बंगाल के मान्यता प्राप्त मदरसों के 361 शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा नियमितीकरण और वेतन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है.

Supreme Court

पश्चिम बंगाल के मान्यता प्राप्त मदरसों में कार्यरत 350 से अधिक शिक्षकों और 40 गैर-शिक्षक कर्मचारियों को देश की सर्वोच्च अदालत से बहुत बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित (कन्फर्म) करने और राज्य सरकार की ‘ग्रांट-इन-एड’ (सरकारी अनुदान) योजना के तहत नियमित वेतन देने की मुख्य मांग को सिरे से खारिज कर दिया है.

361 याचिकाओं में नहीं मिला कोई कानूनी आधार

माननीय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की खंडपीठ ने इस संवेदनशील मामले पर अपना अंतिम फैसला सुनाया है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि उसने कुल 361 याचिकाकर्ताओं में से 13 चुनिंदा मामलों की बहुत गहराई और विस्तार से कानूनी जांच की. इस सघन जांच में कोर्ट ने पाया कि किसी भी मामले में याचिकाकर्ताओं को अदालत की तरफ से कोई राहत या नियमितीकरण प्रदान करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है. इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने सभी 361 याचिकाकर्ताओं के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया.

क्या है पूरा विवाद?

यह पूरा कानूनी विवाद ‘पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम 2008’ (West Bengal Madrasah Service Commission Act, 2008) के क्रियान्वयन और उसके तहत हुई नियुक्तियों से जुड़ा है:

  • 2014 और 2015: कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने अलग-अलग फैसलों में इस कानून को पूरी तरह असंवैधानिक (अनकॉन्स्टिट्यूशनल) घोषित कर दिया था.
  • 2016: कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील होने पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी थी.
  • 6 जनवरी 2020: सुप्रीम कोर्ट ने ‘एस.के. मोहम्मद रफीक बनाम मैनेजिंग कमेटी’ सहित अन्य जुड़े मामलों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साल 2008 के इस मदरसे से जुड़े कानून को पूरी तरह संवैधानिक और वैध ठहरा दिया था.

नियुक्तियों पर उठा था बड़ा सवाल

असली विवाद उन नियुक्तियों और नियुक्त किए गए स्टाफ को लेकर पैदा हुआ, जिनकी जॉइनिंग साल 2015 में कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले आने के बाद और साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले आने के बीच की मध्य अवधि (गैप पीरियड) में की गई थी. इन विवादित नियुक्तियों की सत्यता जांचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2023 में एक उच्च स्तरीय जांच समिति (कमेटी) का गठन किया था. इस जांच समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में इन सभी नियुक्तियों को स्थापित नियमों के खिलाफ और पूरी तरह ‘अवैध’ माना था.

अंतरिम राहत भी हुई समाप्त

जांच समिति की इसी प्रतिकूल रिपोर्ट को चुनौती देते हुए करीब 361 पीड़ित शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने सीधे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 (Article 32) के तहत रिट याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने जांच समिति की उस रिपोर्ट के निष्कर्षों को पूरी तरह बरकरार रखा है और दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है. कोर्ट के इस अंतिम आदेश के बाद इन कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति, सेवा को भविष्य में जारी रखने और सरकारी खजाने से अनुदान के तहत स्थायी वेतन पाने की सभी कानूनी उम्मीदें समाप्त हो गई हैं.

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उल्लेखनीय है कि जब प्रभावित कर्मचारियों ने समिति के निष्कर्षों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, तब अदालत ने पूर्व में अगस्त 2024 में एक अंतरिम आदेश के माध्यम से इन याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को अंतरिम संरक्षण (प्रोटेक्शन) दिया था. इसके बाद, मई 2025 में भी अदालत ने मानवीय आधार पर राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह उन याचिकाकर्ताओं को नियमित वेतन का भुगतान जारी रखे, जो वास्तव में स्कूलों/मदरसों में जमीनी स्तर पर शिक्षण कार्य कर रहे थे; बशर्ते यह व्यवस्था आगे का कोई अन्य आदेश आने तक ही प्रभावी थी. अब अंतिम फैसला आने के बाद वह अंतरिम राहत स्वतः समाप्त हो गई है.



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