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Taslima Nasreen: कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं यह लेखिका बरसों बाद लौटेंगी वापस, बंगाल में गरमाई सियासत

TASLIMA NASREEN RETURN: इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन 1 अगस्त को कोलकाता आ रही हैं. उनकी इस यात्रा पर राजनीतिक बहस छिड़ गई है. इस लेखिका ने शरिया के खिलाफ भी आवाज उठाई थी.

taslima nasreen controversy

Taslima Nasreen Kolkata Visit: कट्टरपंथ और मजहबी रूढ़िवादिता के खिलाफ मुखर रहने वाली मशहूर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की आगामी कोलकाता यात्रा ने देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है. कट्टरपंथियों के लंबे समय से निशाने पर रहीं यह लेखिका आगामी 1 अगस्त को कोलकाता में आयोजित होने वाले एक कट्टरवाद-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने जा रही हैं. इस यात्रा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) के लिए एक बड़ी कसौटी के रूप में देखा जा रहा है.

तस्लीमा नसरीन की इस वापसी की पृष्ठभूमि पिछले साल मार्च में ही तैयार हो गई थी, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सांसद और पश्चिम बंगाल के वर्तमान पार्टी प्रमुख समिक भट्टाचार्य ने संसद के उच्च सदन में यह मांग उठाई थी कि तस्लीमा को दोबारा कोलकाता लौटने की अनुमति दी जाए.

2007 में वामपंथ सरकार ने घुटने टेके, अब TMC ने उठाया सवाल

तस्लीमा नसरीन का कोलकाता से एक बेहद दर्दनाक इतिहास जुड़ा हुआ है. नवंबर 2007 में, कट्टरपंथी समूहों ने उनकी आत्मकथात्मक रचना ‘द्विखंडितो’ (दो भागों में विभाजित) के खिलाफ पूरे कोलकाता शहर में हिंसक बंद और भयानक दंगे भड़का दिए थे, जिसमें उन्हें देश से निष्कासित करने की मांग की गई थी. भारी दबाव के आगे झुकते हुए तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने कथित तौर पर कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए और नसरीन को जबरन कोलकाता से बाहर जाना पड़ा था. इसके बाद आई तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार के दौरान भी उनके प्रवेश और रचनाओं पर प्रतिबंध जारी रहा.

अब उनकी इस प्रस्तावित यात्रा पर विपक्ष ने तंज कसना शुरू कर दिया है. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता सुजान चक्रवर्ती ने तत्कालीन वामपंथी सरकार का बचाव करते हुए कहा कि कोई विदेशी नागरिक कहाँ रहेगा, यह राज्य का नहीं बल्कि केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय का निर्णय है. वहीं, तृणमूल कांग्रेस के विधायक अखरुज्जमा ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि तस्लीमा ने मुस्लिम समुदाय और इस्लाम में शरिया के विरुद्ध बहुत कुछ कहा है, इसलिए यदि कोई मुसलमानों के विरुद्ध बोलता है तो डबल इंजन सरकार उसका सम्मान करेगी. हालांकि, नई राज्य सरकार इस आयोजन को एक वैचारिक उलटफेर के रूप में पेश कर रही है और तस्लीमा की सुरक्षा व्यवस्था को सक्रिय रूप से बढ़ा रही है.

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कट्टरपंथियों ने तस्लीमा के खिलाफ क्या-क्या किया?

तस्लीमा नसरीन को अपनी स्वतंत्र सोच और लेखन के लिए जीवन भर कट्टरपंथियों के क्रूर विरोध का सामना करना पड़ा है:

दंगे और फतवे: साल 2007 में कोलकाता में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सेना बुलाने तक की नौबत ला दी थी. ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम जैसे संगठनों ने हिंसक प्रदर्शन किए. भारत ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश और भारत के कई मौलानाओं ने उनके खिलाफ सिर कलम करने तक के फतवे जारी किए और उन पर इनाम रखा.

हैदराबाद में हमला: साल 2007 में ही हैदराबाद में एक पुस्तक विमोचन के दौरान मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (MIM) के विधायकों और कट्टरपंथियों की भीड़ ने उन पर मंच पर ही लाइव हमला कर दिया था, जिसमें उन्हें कुर्सियों और गुलदस्तों से मारा गया था.

तस्लीमा को बांग्लादेश से निकलकर क्यों भागना पड़ा?

तस्लीमा नसरीन पेशे से एक डॉक्टर थीं, लेकिन जब उन्होंने लिखना शुरू किया तो उनके निशाने पर पितृसत्ता और धार्मिक कट्टरपंथ था.

‘लज्जा’ उपन्यास का विवाद: साल 1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुए अत्याचारों और दंगों पर तस्लीमा ने ‘लज्जा’ (Lajja) नामक उपन्यास लिखा.

देश निकाला और वारंट: इस किताब के आते ही बांग्लादेश के कट्टरपंथी भड़क उठे. सरकार ने किताब पर प्रतिबंध लगा दिया. मौलानाओं ने उनके खिलाफ ईशनिंदा (Blasphemy) के तहत मौत की सजा की मांग की. कट्टरपंथियों के भारी विरोध और अपनी जान पर आए खतरे के बाद साल 1994 में तस्लीमा को गुपचुप तरीके से बांग्लादेश छोड़कर भागना पड़ा और तब से वे निर्वासन (Exile) में जी रही हैं.

बचपन में तसलीमा नसरीन के साथ क्या हुआ था?

तस्लीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथाओं में अपने बचपन के उन भयानक और काले सच का खुलासा किया है, जिसने उनकी सोच को झकझोर कर रख दिया था:

यौन शोषण का शिकार: तस्लीमा ने खुलकर लिखा है कि बचपन और किशोरावस्था के दौरान उनके अपने ही रिश्तेदारों और परिवार के करीबी पुरुषों द्वारा उनका गंभीर यौन शोषण (Child Sexual Abuse) किया गया था.

बचपन में हुई ज्‍यादती ने बनाया विद्रोही: बचपन में मिले इन कड़वे अनुभवों, घरेलू हिंसा और समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखकर उनके मन में पुरुषों के वर्चस्व और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ विद्रोह की भावना जागी, जिसने आगे चलकर उन्हें एक निर्भीक और क्रांतिकारी लेखिका बना दिया.

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