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जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के बीच जानिए उन बड़े नेताओं के बारे में जिन्होंने पहले भी छोड़ी हैं सत्ता की कुर्सियां!

दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है. आइए नजर डालते हैं इतिहास के उन पन्नों पर जब कद्दावर नेताओं ने खुद आगे बढ़कर अपनी कुर्सियां छोड़ दी थीं.

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Political Resignations in India: आजकल राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच लगातार केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई जा रही है. राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि क्या मौजूदा दौर के नेता इस दबाव के आगे झुकेंगे? लेकिन राजनीति में इस्तीफे का यह खेल कोई नया नहीं है. आइए इतिहास के पन्नों को पलटकर जानते हैं कि इससे पहले किन बड़े और कद्दावर नेताओं ने नैतिक जिम्मेदारी या राजनीतिक दबाव के चलते खुद आगे बढ़कर अपनी कुर्सियां छोड़ दी थीं.

इस परंपरा के सबसे बड़े प्रतीक देश के पहले रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे. नवंबर 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर में हुए भीषण रेल हादसे में करीब 140 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी. इस बड़ी दुर्घटना की पूरी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया था, जिसे आखिरकार मंजूर कर लिया गया.

शास्त्री जी द्वारा शुरू की गई यह मिसाल दशकों बाद फिर देखने को मिली. अगस्त 1999 में पश्चिम बंगाल के गैसल स्टेशन के पास दो ट्रेनों की आमने-सामने की टक्कर में लगभग 285 लोगों की मौत हो गई थी. इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने बिना एक पल गंवाए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

साल 2000 में रेल मंत्री रहते हुए ममता बनर्जी ने भी हादसों के बाद अपना इस्तीफा सौंपा था, जिसे तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वीकार नहीं किया था. वहीं, इस कड़ी में आखिरी बड़ा नाम सुरेश प्रभु का आता है जिन्होंने 2017 में कुछ ही दिनों के भीतर हुए दो रेल हादसों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पीएम मोदी को इस्तीफा सौंप दिया था.

सिर्फ रेल हादसे ही नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा में बड़ी चूक भी कई बार बड़े पदों पर बैठे लोगों की कुर्सी ले डूबी. नवंबर 2008 में जब पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने मुंबई को दहला दिया और देश की सुरक्षा एजेंसियों की भारी फजीहत हुई, तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल को अपनी नाकामी मानते हुए इस्तीफा देना पड़ा था.

26/11 मुंबई हमले के दौरान प्रशासनिक मोर्चे पर उठ सवालों के बीच महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को भी अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. उनके बाद कमान संभालने वाले अशोक चव्हाण का कार्यकाल भी विवादों में रहा, और साल 2010 में आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले में नाम आने के बाद उन्हें भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

हादसों और सुरक्षा चूक के अलावा भ्रष्टाचार के मामलों ने भी कई दिग्गज नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया. साल 2001 में तहलका स्टिंग ऑपरेशन में रक्षा सौदों पर सवाल उठने के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस को पद छोड़ना पड़ा था. इसके अलावा 2010 के बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में घिरने के बाद दूरसंचार मंत्री ए. राजा को भी इस्तीफा देना पड़ा था.

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-भारत एक्सप्रेस



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