श्रीलंका के इतिहास में 1980 का दशक बेहद उथल-पुथल भरा दौर था. देश के उत्तरी हिस्से में तमिल समुदाय के अधिकारों और अलग राष्ट्र की मांग को लेकर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था. शुरुआत में यह आंदोलन राजनीतिक मांगों के साथ सामने आया, लेकिन समय के साथ इसका रास्ता हिंसा की ओर बढ़ गया.
साल 1983 में लिट्टे के हमले में 13 श्रीलंकाई सैनिकों की मौत हुई. इसके बाद श्रीलंका में हिंसा भड़क गई और सरकार तथा लिट्टे के बीच संघर्ष ने गृहयुद्ध का रूप ले लिया. इस लड़ाई का असर सिर्फ श्रीलंका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत भी इससे प्रभावित हुआ. बड़ी संख्या में तमिल शरणार्थी समुद्र के रास्ते भारत पहुंचने लगे. वहीं, लिट्टे भारत के तमिल इलाकों में भी अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रहा था.
1986 में हालात और गंभीर हो गए, जब श्रीलंकाई सेना ने तमिल बहुल क्षेत्र जाफना में सैन्य कार्रवाई शुरू की. नागरिकों की मौत और मानवीय संकट को देखते हुए भारत ने हस्तक्षेप करने का फैसला किया. भारतीय मदद पहुंचाने के लिए ऑपरेशन ‘पवन’ की शुरुआत हुई. जब समुद्री रास्ते से सहायता भेजने की कोशिश को श्रीलंका ने रोक दिया, तो भारत ने साफ कर दिया कि जरूरत पड़ने पर वह हवाई रास्ते से मदद पहुंचाएगा और भारतीय विमानों की सुरक्षा उसकी जिम्मेदारी होगी.
इस दबाव के बाद श्रीलंका सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई. जुलाई 1987 में भारत और श्रीलंका के बीच समझौता हुआ और भारतीय शांति सेना यानी IPKF को जाफना भेजा गया. इस समझौते के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी खुद कोलंबो पहुंचे थे.
30 जुलाई 1987: वह हमला जिसने सबको चौंका दिया
समझौते के बाद विदाई समारोह के दौरान राजीव गांधी श्रीलंका की नौसेना के जवानों का गार्ड ऑफ ऑनर स्वीकार कर रहे थे. तभी एक सैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि अचानक अपनी कतार से बाहर निकला और उसने राइफल की बट से राजीव गांधी पर हमला करने की कोशिश की.
राजीव गांधी ने खतरे को भांपते हुए तुरंत झुककर खुद को बचा लिया. इसके बावजूद उन्हें हल्की चोट लगी. सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हमलावर को पकड़ लिया और कुछ ही पलों में स्थिति संभाल ली गई. विदेशी जमीन पर किसी भारतीय प्रधानमंत्री पर हुआ यह अपनी तरह का पहला हमला था.
इस घटना की सबसे खास बात यह रही कि पूरा घटनाक्रम कैमरे में कैद हो गया. श्रीलंका के सरकारी अखबार ‘डेली न्यूज’ के फोटोग्राफर सेना विदानागमा उस समय समारोह की तस्वीरें ले रहे थे. उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनका कैमरा कुछ ही सेकंड बाद इतिहास का हिस्सा बनने वाली तस्वीर रिकॉर्ड करने वाला है.
विदानागमा ने बताया था कि उन्होंने अचानक एक सैनिक को आगे बढ़ते देखा और तुरंत कैमरे का बटन दबा दिया. बाद में जब फिल्म तैयार हुई, तो सामने आया कि उन्होंने वही दुर्लभ क्षण कैद कर लिया था, जब हमला होने वाला था और राजीव गांधी खुद को बचाने के लिए झुक रहे थे.
यह तस्वीर सिर्फ एक हमले की तस्वीर नहीं थी, बल्कि उस समय के तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल की गवाही भी थी. भारत-श्रीलंका समझौते को लेकर श्रीलंका में विरोध हो रहा था. कई जगह प्रदर्शन हुए और लोगों में नाराजगी थी.
विदानागमा की यह तस्वीर दुनिया भर के अखबारों में प्रकाशित हुई. इसने पूरे घटनाक्रम को दुनिया के सामने साफ तौर पर रखा और इसे छिपाना आसान नहीं रहा. आज भी यह तस्वीर पत्रकारिता में उस ताकत का उदाहरण मानी जाती है, जहां एक सही समय पर लिया गया एक क्लिक इतिहास को हमेशा के लिए दर्ज कर देता है.
हालांकि भारत की शांति सेना 1990 तक श्रीलंका में रही और इस अभियान में करीब 1200 भारतीय जवानों की जान गई. IPKF भेजने के फैसले से लिट्टे और राजीव गांधी के बीच दुश्मनी बढ़ गई. कुछ साल बाद 1991 में लिट्टे के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई.
राजीव गांधी पर श्रीलंका में हुआ हमला आज भी भारत-श्रीलंका संबंधों के सबसे संवेदनशील अध्यायों में गिना जाता है. यह घटना याद दिलाती है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में लिए गए फैसलों का असर कितना दूर तक जा सकता है और कभी-कभी एक तस्वीर पूरे दौर की कहानी कह देती है.
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