बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर दिया गया है. राज्यपाल ने राज्य सरकार की ओर से भेजे गए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद उनके विधान परिषद पहुंचने का रास्ता साफ हो गया है. दीपक प्रकाश अब आधिकारिक तौर पर विधान परिषद के सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे.
दीपक प्रकाश का मनोनयन उस सीट के लिए किया गया है, जो भारतीय जनता पार्टी के एमएलसी देवेश कुमार के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी. इस खाली पद को भरने के लिए बिहार सरकार ने दीपक प्रकाश के नाम की सिफारिश राज्यपाल के पास भेजी थी. मंजूरी मिलने के बाद मनोनयन की पूरी प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है.
मंत्री बनने के बाद से ही उठ रहा था सवाल
दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार सरकार में पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वह राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं. नवंबर 2025 में जब उन्हें पहली बार बिहार सरकार में मंत्री बनाया गया था, तब वह विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे.
इसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बनी सम्राट सरकार में भी उन्हें मंत्री पद पर बरकरार रखा गया. हालांकि, उस समय तक भी वह किसी सदन के सदस्य नहीं बने थे. इसी वजह से उनकी मंत्री पद पर नियुक्ति को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई थी.
भारतीय संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य हुए मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे तय समय सीमा के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है. दीपक प्रकाश का विधान परिषद के लिए मनोनयन इसी संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला
दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति को लेकर कानूनी सवाल भी उठाए गए थे. इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया गया था, जहां उनकी नियुक्ति को लेकर बहस हुई थी. मुख्य सवाल यही था कि जब कोई व्यक्ति किसी सदन का सदस्य नहीं है, तो वह मंत्री पद पर कितने समय तक रह सकता है.
अब राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह विवाद काफी हद तक खत्म होता नजर आ रहा है. विधान परिषद की सदस्यता मिलने से उनकी संवैधानिक स्थिति मजबूत हो गई है और मंत्री पद को लेकर उठ रही आपत्तियों पर भी विराम लगने की उम्मीद है.
दीपक प्रकाश का विधान परिषद पहुंचना बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है. सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद अब वह सदन की कार्यवाही में भी हिस्सा ले सकेंगे और अपने विभाग से जुड़े मुद्दों पर संवैधानिक रूप से भूमिका निभा पाएंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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