सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा और पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर दायर जनहित याचिका पर सख्त आदेश दिया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन कि बेंच ने भारत मे लेन ड्राइविंग की संस्कृति के अभाव को सड़क हादसों का बड़ा कारण बताया है.
अदालत ने केंद्र सरकार से दिल्ली हाई कोर्ट क्रॉसिंग के पास स्पीड ब्रेकर और रंबल स्ट्रिप लगाने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने यह निर्देश सड़क सुरक्षा सुधारों की मांग को लेकर ऑथोपेंडिक सर्जन डॉक्टर एस. राजशेखरन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है. यह याचिका राजशेखरन ने 2013 में दायर किया था.
कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के पास पैदल यात्रियों के लिए क्रॉसिंग न होने पर भी चिंता जताई थी. कोर्ट ने सुरक्षा में एक गंभीर कमी की ओर इशारा किया था, जिससे उन लोगों की जान को खतरा हो सकता है. मामले की सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि भारत मंडपम के बाद पैदल यात्रियों के लिए सड़क पार करने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है.
इसपर जस्टिस पारदीवाला ने एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या सिर्फ रेड लाइट लगाने से समस्या हल हो जाएगी? एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने कहा कि इस पूरे इलाके का ट्रैफिक और पैदल यात्रियों की आवाजाही देखने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाया जाना चाहिए.
उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि दिल्ली हाई कोर्ट जाने के लिए पहले राइट टर्न था, लेकिन अब वह बंद है. लोगों को लेफ्ट की ओर से उतरकर सड़क पार करनी पड़ती है. क्योंकि यहां पर ओवरब्रिज नही है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य बेंच ने फुटपाथ को लेकर एक फिर चिंता व्यक्त कर चुका है. कोर्ट ने कहा था कि फुटपाथ लोगों की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है.
पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित जगह चिन्हित करने पर जोर
कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित देश के सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराजन ने कहा था कि पहला कदम पैदल चलने वालों के लिए जगह को सही ढंग से चिंहित करना है. लोगों को पैदल चलने में सुरक्षा का भरोसा होना चाहिए. जहां भी सड़क हो, लोगों को चिन्हित जगह पर चलना चाहिए.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार है और इसकी रक्षा के लिए नियामक बनाया जाए. कोर्ट ने इस मामले में स्थानीय प्रशासन से परिवहन मंत्रालय तक को पक्षकार बनाने को कहा था. मामले में कोर्ट ने विधि आयोग को भी शामिल करने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने कहा था कि सड़कों पर मोटर गाड़ियों की आवाजाही से ज्यादा अहमियत इस अधिकार को दी जानी चाहिए.
कोर्ट ने कहा था कि इस अधिकार को केवल घोषित करने के लिए ही नही, बल्कि इसके उल्लंघन पर पीड़ितों को मुआवजा और अन्य राहत देने के लिए कानूनी ढांचा बनाए जाने की जरूरत है. कोर्ट ने कहा था कि चलने का अधिकार संविधान के भाग 3 के तहत मौलिक अधिकार है. यह अनुच्छेद 19 (1)(d) द्वारा दिए गए घूमने-फिरने के अधिकार का हिस्सा है. साथ ही यह अनुच्छेद 19(1) (a), अनुच्छेद 19 (1) (b), अनुच्छेद 19 (1)(c) और अनुच्छेद 21 से जुड़ा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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