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चंडीगढ़ में प्राइवेट कैब सर्विसेज पर पाबंदियों से ड्राइवरों की रोजी-रोटी ठप, यात्रियों के पास बचा एक ऑप्शन; सड़कों पर प्रदर्शन

CHANDIGARH CAB RESTRICTIONS: चंडीगढ़ में निजी राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म्स पर लागू प्रशासनिक पाबंदियों के कारण हजारों कैब ड्राइवरों की आजीविका पर गहरा संकट आ खड़ा हुआ है. वहीं ट्राइसिटी के यात्रियों के पास आवाजाही के लिए महज एक विकल्प बच जाने से बाजार में एकाधिकार (Monopoly) का खतरा पैदा हो गया है, जिसको लेकर नीतिगत समानता और पारदर्शी नियमों की मांग उठ रही है.

फोटो: भारत एक्सप्रेस इंग्लिश

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

Chandigarh Cab services: केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में प्रमुख निजी राइड-हेलिंग (कैब) प्लेटफॉर्मों पर प्रशासनिक पाबंदियां लागू होने के बाद शहरी परिवहन व्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है. कई स्थापित निजी राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म्स के पहिए थमने के कारण शहर में केवल सरकार समर्थित ‘भारत टैक्सी’ ही संचालन कर पा रही है.

इस असंतुलित व्यवस्था ने एक बड़ा नीतिगत सवाल खड़ा कर दिया है: क्या चंडीगढ़ का मोबिलिटी बाजार सीधे तौर पर एकाधिकार (Monopoly) की ओर धकेला जा रहा है, जहां निजी प्रतिस्पर्धियों को बाहर कर केवल एक प्लेटफॉर्म को फायदा पहुंचाया जा रहा है?

ड्राइवरों पर दोहरी मार: गाड़ी की EMI और बच्चों की फीस अटकी

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दर्दनाक असर जमीनी स्तर पर दिन-रात स्टेयरिंग थामने वाले कैब ड्राइवरों पर पड़ा है. राइड-हेलिंग हजारों चालकों के जीवनयापन का एकमात्र साधन है. कई दिनों से बुकिंग ठप होने के चलते ड्राइवरों के सामने गाड़ियों की मासिक किस्त (Cab EMI), इंश्योरेंस, मेंटेनेंस और रोजमर्रा का ईंधन खर्च निकालना नामुमकिन हो गया है.

इसके साथ ही, बच्चों के स्कूलों की फीस और राशन जैसे बुनियादी पारिवारिक खर्चों पर भी आफत आ गई है. प्लेटफॉर्म इकोनॉमी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि ड्राइवर अपनी सुविधा और बेहतर कमाई के अनुसार किसी भी ऐप को चुनने के लिए स्वतंत्र थे, लेकिन मौजूदा पाबंदियों ने उनकी यह बुनियादी आजादी भी छीन ली है.

ट्राइसिटी के यात्रियों के विकल्प हुए पूरी तरह सीमित

राइड-हेलिंग सेवाएं चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला (Tricity) में आम जनजीवन की जीवनरेखा बन चुकी हैं. सुबह ऑफिस और कॉलेज जाने वाले प्रोफेशनल्स व छात्रों से लेकर इमरजेंसी में अस्पताल पहुंचने, देर रात रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट ट्रांसफर तथा फर्स्ट-एंड-लास्ट माइल कनेक्टिविटी के लिए लाखों निवासी इन ऐप्स पर निर्भर हैं.

बाजार में बहु-विकल्प होने पर यात्री किरायों, कैब की उपलब्धता और वेटिंग टाइम की तुलना कर सबसे बेहतर सेवा चुनते थे. अब प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्म्स के हटने से यात्रियों को मजबूरी में केवल एक ही सेवा पर निर्भर होना पड़ रहा है, जिससे उनका उपभोक्ता अधिकार और चयन की स्वतंत्रता खत्म हो गई है.

एक पर नरमी, दूसरे पर सख्ती: क्या बन रहा है एकाधिकार?

इस पूरे विवाद की जड़ में विनियामक विसंगतियां हैं. निजी कैब एग्रीगेटर्स पर नियामकीय और किराए से जुड़ी औपचारिकताओं का हवाला देकर रोक लगाई गई है, जबकि आरोप लग रहे हैं कि सरकार समर्थित ‘भारत टैक्सी’ का मूल्य निर्धारण ढांचा भी उन्हीं तय किराया मानकों पर खरा उतरता है या नहीं, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.

यदि दोनों के सामने समान नियामकीय मुद्दे हैं, तो निजी प्रतिस्पर्धियों को प्रतिबंधित कर केवल एक प्लेटफॉर्म को खुली छूट क्यों दी गई? भारत जैसे गतिशील बाजार और चंडीगढ़ जैसे आधुनिक, भविष्योन्मुखी शहर में एकाधिकारवादी व्यवस्था सेवा की गुणवत्ता, तकनीकी सुधार और सुरक्षा मानकों के लिहाज से बेहद नुकसानदेह साबित हो सकती है.

विनियमन के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की दरकार

परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि नियमों का पालन सुनिश्चित कराना जरूरी है, लेकिन नियम पारदर्शी और सभी ऑपरेटरों पर समान रूप से लागू होने चाहिए. किसी भी यात्री को विकल्पों के अभाव में एकल सेवा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. समय रहते इस गतिरोध का समाधान निकालना बेहद आवश्यक है, ताकि संकट झेल रहे कैब चालकों की कमाई फिर से पटरी पर लौट सके और चंडीगढ़ के निवासियों को उनकी पसंदीदा परिवहन सुविधाएं वापस मिल सकें.



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