भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्तों की बात जब भी होती है, तो दिमाग में सबसे पहले तनाव, सरहद पर खींचतान और राजनीति की बातें ही आती हैं. दोनों तरफ की सरहदें भले ही नफरत की दीवारें खड़ी करती हों, लेकिन कला और संगीत ऐसी चीजें हैं जो इन सभी दीवारों को चुटकियों में गिरा देती हैं. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि सरहदें भले ही कागजों पर इंसानों को बांटती हों, लेकिन दिलों को नहीं बांट सकतीं.
सोशल मीडिया के दौर में पाकिस्तान के दो मशहूर कव्वाल उस्ताद फरीद अयाज और अबू मोहम्मद का गाया हुआ एक वीडियो इन दिनों इंटरनेट पर धूम मचा रहा है. इस वीडियो में दोनों फनकार जिस खूबसूरती से ‘हे कन्हैया! याद है कुछ भी हमारी…’ गा रहे हैं, उसे सुनकर पहली बार में ऐसा लगता है कि कोई पारंपरिक हिंदू भजन चल रहा है. लेकिन गौर से सुनने पर पता चलता है कि यह भगवान कृष्ण को समर्पित एक बेहद खूबसूरत सूफी कव्वाली है, जिसे पाकिस्तान के कराची शहर में बैठकर इन कलाकारों ने अपनी रूहानी आवाज़ दी है.
सूफी परंपरा और मोहब्बत का अनूठा संगम
यह कव्वाली कोई आम रचना नहीं है, बल्कि इसे दक्खन के सूफी शायर नवाब सादिक जंग बहादुर ‘हिल्म’ ने लिखा था. सूफी परंपरा की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वहां भगवान या खुदा को किसी मजहब के चश्मे से नहीं देखा जाता, बल्कि उसे अपना सबसे प्यारा महबूब यानी प्रिय माना जाता है. शायर ने भी कृष्ण को भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अपने उस महबूब के रूप में पुकारा है जिसके वियोग में दिल बेचैन रहता है.
जब उस्ताद फरीद अयाज अपनी 800 साल पुरानी गायकी की विरासत के साथ इस कव्वाली को मंच पर गाते हैं, तो वहां सुनने वाला कोई हिंदू या मुसलमान नहीं रह जाता. वहां केवल एक ऐसा प्रेमी बचता है जो अपने इष्ट, अपने कन्हैया को पाने के लिए तड़प रहा है.
क्या कहती है इस रूहानी कव्वाली की दास्तां?
इस कव्वाली में कृष्ण के प्रति प्रेम और उनके बिछड़ने का दर्द है. कव्वाल गाते हैं कि भगवान को ढूंढने और उनका पता लगाने के लिए न जाने कहां-कहां मिन्नतें की गईं, लेकिन प्रिय के दर्शन नहीं हुए. इसमें एक सच्चे आशिक की तरह कन्हैया से यह सवाल किया गया है कि क्या उन्हें अपने उस भक्त की ज़रा भी सुध है या नहीं?
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-भारत एक्सप्रेस
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