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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांचों रेजिडेंट डॉक्टरों को सेवा बांड से दी छूट, सरकारी अस्पतालों में कुछ महीने और करनी होगी सेवा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केजीएमयू और लोहिया संस्थान के पांच डॉक्टरों को सुपर-स्पेशियलिटी कोर्स में एडमिशन के चलते सेवा बांड से राहत दे दी है. हालांकि, कोर्ट ने जनहित को ध्यान में रखते हुए उन्हें कुछ महीने और सरकारी अस्पतालों में सेवाएं देने का निर्देश दिया है.

Allahabad High Court

डॉक्टरों को सेवा बांड से राहत

Allahabad High Court: मेडिकल के क्षेत्र में करियर बनाने की सोच रहे युवाओं और सरकारी अस्पतालों में सेवा दे रहे डॉक्टरों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है. कोर्ट ने डॉक्टर कविता यादव समेत पांच डॉक्टरों को उनके सेवा बांड से मुक्त करने का आदेश दे दिया है. हालांकि, इसके एवज में इन सभी डॉक्टरों को कुछ और महीने सरकारी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देनी होंगी, ताकि स्वास्थ्य व्यवस्था को जरूरी डॉक्टर मिल सकें.

क्या था पूरा मामला?

इन सभी पांच याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने साल 2018-19 के दौरान किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) लखनऊ और एक अन्य डॉक्टर ने डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से पीजी (PG) कोर्स में दाखिला लिया था. नियम के मुताबिक, एडमिशन के वक्त उन्हें एक बांड भरना पड़ा था, जिसके तहत पीजी पूरा करने के बाद उन्हें दो साल तक उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देनी थीं.

उस समय के 7 मार्च 2018 के शासनादेश में यह प्रावधान था कि यदि कोई अभ्यर्थी पीजी के बाद उच्च शिक्षा यानी सुपर-स्पेशियलिटी कोर्स के लिए चुना जाता है, तो उसे बांड की बाकी सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा. यही वजह है कि पीजी की पढ़ाई और कुछ समय की सेवा पूरी करने के बाद जब इन डॉक्टरों का चयन सुपर-स्पेशियलिटी डिप्लोमा कोर्स में हुआ, तो उन्होंने बांड से पूरी तरह मुक्ति के लिए अर्जी दी. लेकिन 23 मार्च 2026 को उनकी यह अर्जी खारिज कर दी गई, क्योंकि 5 जनवरी 2022 को आए एक संशोधित शासनादेश के तहत यह साफ कर दिया गया था कि “उच्च शिक्षा” की छूट केवल एमडी/एमएस (MD/MS) कोर्स के लिए ही मिलेगी, डिप्लोमा कोर्सेस के लिए नहीं.

कोर्ट ने निकाला बीच का रास्ता

डॉक्टरों का तर्क था कि उनका बांड पुराने नियमों के तहत भरा गया था, इसलिए नया आदेश उन पर लागू नहीं होना चाहिए. मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने जनहित और डॉक्टरों की करियर जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हुए एक व्यावहारिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने पूछा था कि क्या ये डॉक्टर कुछ महीने और सरकारी अस्पतालों में सेवा देने को तैयार हैं?

इस पर डॉक्टरों की तरफ से सकारात्मक जवाब दाखिल किया गया. अदालत ने सभी की स्थिति को देखते हुए सेवा की अवधि तय कर दी:

डॉ. कविता यादव और डॉ. नीरज गौतम: 6 महीने और सेवा देंगी/देंगे.

डॉ. प्रेरणा प्रभात दास और डॉ. कनिका बंसल: 9 महीने और सेवा देंगी.

डॉ. यतेंद्र कुमार: पहले ही 18 महीने से ज्यादा सेवा दे चुके हैं, इसलिए उन्हें सिर्फ 3 महीने और सेवा देनी होगी.

अदालत ने स्पष्ट किया कि जैसे ही यह तयशुदा अतिरिक्त अवधि पूरी हो जाएगी, इन सभी को बांड की बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा. साथ ही, सभी डॉक्टरों को 2 नवंबर 2026 को अपने-अपने पूर्व संस्थानों में रिपोर्ट करने का निर्देश देते हुए इस याचिका का निस्तारण कर दिया गया है. कोर्ट के इस फैसले को स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों, दोनों के लिहाज से एक संतुलित कदम माना जा रहा है.

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-भारत एक्सप्रेस



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