झारखंड में नियुक्ति घोटाले का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है. विपक्ष इस मामले को छोड़ने के मूड में नहीं है. बीजेपी विधायक दल के नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी लगातार अलग-अलग इलाकों का दौरा कर रहे हैं और नियुक्तियों में कथित गड़बड़ी को लेकर सरकार और अधिकारियों पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आती है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.
बाबूलाल मरांडी का आरोप है कि नियुक्ति से जुड़े मामलों में सिर्फ छोटे स्तर के लोगों की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा. उनका कहना है कि अगर किसी बड़े अधिकारी की भूमिका सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी मामला दर्ज होना चाहिए. बीजेपी की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर नियुक्ति प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी.
विपक्ष का दावा है कि पूरे मामले की तह तक जाने के लिए जांच एजेंसियों को स्वतंत्र तरीके से काम करने दिया जाना चाहिए. बीजेपी इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है.
JMM ने पलटवार करते हुए पुराने मामलों का जिक्र किया
दूसरी ओर, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बाबूलाल मरांडी के आरोपों को खारिज करते हुए बीजेपी पर ही सवाल खड़े किए हैं. पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज कुमार पांडे का कहना है कि अगर नियुक्तियों में गड़बड़ी की बात हो रही है, तो बीजेपी को उन मामलों पर भी जवाब देना चाहिए जिनमें उसके नेताओं या सरकारों से जुड़े सवाल उठे हैं.
JMM का कहना है कि सिर्फ झारखंड में हुए मामले को लेकर राजनीति करने के बजाय बीजेपी नेताओं को देश के दूसरे हिस्सों में सामने आए नियुक्ति विवादों पर भी अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए. पार्टी के मुताबिक, झारखंड में मौजूदा मामले की जांच सीआईडी कर रही है और जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों को अदालत के सामने भी रखा जा रहा है.
युवाओं के भविष्य से जुड़ा है मामला
नियुक्ति घोटाले की इस राजनीतिक लड़ाई के बीच सबसे अहम सवाल उन युवाओं का है, जो सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं. सालों तक परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष नियुक्ति प्रक्रिया बेहद जरूरी है.
झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की कार्यप्रणाली पर पहले भी अलग-अलग समय में सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में मौजूदा विवाद ने एक बार फिर भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही को चर्चा में ला दिया है.
राजनीतिक दल एक-दूसरे पर पुराने मामलों का हवाला देकर आरोप लगा रहे हैं. यही वजह है कि इस पूरे विवाद ने अब ‘तेरा घोटाला बनाम मेरा घोटाला’ जैसी राजनीतिक बहस का रूप ले लिया है. लेकिन इस सियासी खींचतान के बीच असली उम्मीद उन अभ्यर्थियों की है, जो चाहते हैं कि जांच निष्पक्ष हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और भविष्य में नियुक्तियों को लेकर किसी तरह का संदेह ना रहे.
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-भारत एक्सप्रेस
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