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CRPS Disease: सोचिए, अगर किसी के पैर में हर वक्त ऐसा दर्द हो जैसे अंदर आग सुलग रही हो, कोई लगातार चाकू से गोद रहा हो या बिजली का झटका लग रहा हो, तो वह इंसान कैसे जिएगा? ब्रिटेन की 20 साल की जेस बर्किनशॉ ने कई सालों तक इसी खौफनाक दर्द को सहा. स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि जूता या मोजा पहनना तो दूर, वह लगातार आठ महीनों तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकल सकीं. आखिरकार इस असहनीय तकलीफ से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने डॉक्टरों से अपना पैर काटने की गुहार लगाई.
16 महीने की उम्र से शुरू हुई दास्तान
इंग्लैंड के लीड्स की रहने वाली जेस महज 16 महीने की थीं, जब उन्हें जुवेनाइल इडियोपैथिक आर्थराइटिस (JIA) नाम का बच्चों वाला गठिया हो गया था. इसके कारण उनके जोड़ों में सूजन और तेज दर्द रहता था. हालांकि, असली मुसीबत तब शुरू हुई जब 15 साल की उम्र में उनके दाहिने टखने का दर्द अचानक बेकाबू हो गया. जांच में पता चला कि वह कॉम्प्लेक्स रीजनल पेन सिंड्रोम (CRPS) नाम की बेहद दुर्लभ और घातक बीमारी से पीड़ित हैं. इसमें नसों को नुकसान पहुंचने के बाद शरीर के हिस्से में ऐसा दर्द होता है जो कभी ठीक नहीं होता. जेस के मुताबिक, 1 से 10 के पैमाने पर उनका दर्द कभी 7 से नीचे आता ही नहीं था.
दवाइयों का असर और डिप्रेशन
दर्द के कारण जेस का स्कूल जाना बंद हो गया और उन्होंने घर से ही पढ़ाई की. न सो पाने और भारी-भरकम दवाओं के सेवन से उनकी दिमागी हालत पर भी असर पड़ा. वह डिप्रेशन, एंग्जायटी और हैलुसिनेशन (भ्रम की स्थिति) से जूझने लगीं. सर्जरी और स्पाइनल कॉर्ड स्टिमुलेटर जैसे कई इलाज आजमाए गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.
दो साल तक डॉक्टरों से चर्चा
जब सारे रास्ते बंद हो गए, तो जेस ने डॉक्टर्स से पैर काटने की बात की. लगभग दो साल तक इस पर मंथन चला. तीन सर्जनों से सलाह ली गई. हालांकि यह गारंटी नहीं थी कि पैर काटने के बाद दर्द पूरी तरह खत्म होगा, लेकिन जेस ने यह जोखिम उठाने का मन बना लिया. आखिरकार इस साल अप्रैल में जेस की दाहिनी टांग का अम्प्यूटेशन कर दिया गया.
प्रोस्थेटिक लेग का इंतजार
ऑपरेशन के करीब दो महीने बाद जेस को दर्द में बड़ी राहत महसूस होने लगी. अब वह घर से बाहर निकल रही हैं, बेहतर नींद ले पा रही हैं और आजादी महसूस कर रही हैं. फिलहाल उनका प्रोस्थेटिक पैर बनाया जा रहा है और वह फिजियोथेरेपी की मदद ले रही हैं. जेस अब सोशल मीडिया पर अपनी कहानी शेयर कर क्रोनिक पेन से जूझ रहे लोगों को जागरूक कर रही हैं. उनका मानना है कि यह फैसला कोई अंत नहीं, बल्कि उनकी नई जिंदगी की शुरुआत है.
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-भारत एक्सप्रेस
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