प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (Twitter) पर देश और दुनिया के कल्याण की कामना करते हुए एक विशेष सुभाषित साझा किया. पीएम मोदी ने वैदिक मंत्र के जरिए सभी को पापरहित रहने और धर्म व सत्य के शुभ मार्ग पर चलने का पावन संदेश दिया. प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए इस संस्कृत श्लोक में मानव जीवन को एक नौका और संसार को सागर मानकर कल्याण, शांति और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की गई है.
प्रधानमंत्री ने साझा किया ऋग्वेद का यह पावन मंत्र
पीएम मोदी ने संस्कृत का प्रसिद्ध श्लोक साझा किया:
“सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्. दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥”
इस श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ है कि मनुष्य को उत्तम रक्षा करने वाली स्थिर पृथ्वी, कल्याणकारी व निर्बाध आकाश का आश्रय लेना चाहिए. मनुष्य पापरहित होकर सत्य और धर्म रूपी पतवारों वाली दिव्य नौका पर सवार होकर अपने जीवन में परम सुख और मंगल को प्राप्त करे.
जानिए क्या है इस वैदिक मंत्र का पौराणिक महत्व
यह मंत्र मुख्य रूप से ऋग्वेद के 10वें मंडल के 63वें सूक्त का 10वां मंत्र है, जो अथर्ववेद और शुक्ल यजुर्वेद में भी मिलता है. सनातन परंपरा में इस मंत्र का प्रयोग ‘स्वस्ति-वाचन’ यानी सर्वत्र कल्याण और शांति की प्रार्थना के लिए किया जाता है. इसमें देवताओं की स्तुति करते हुए जीवन-यात्रा को बिना किसी बाधा के सफलता पूर्वक पूरा करने की कामना की जाती है.
‘धर्म और सत्य की दिव्य नौका’
मंत्र के माध्यम से ऋषियों ने संदेश दिया है कि यह संसार एक अथाह समुद्र की तरह है, जहां सुख-दुख और चुनौतियों के तूफान आते रहते हैं. इस भवसागर को पार करने के लिए ज्ञान, भक्ति और सत्कर्म की एक ऐसी नौका चाहिए जिसमें अज्ञान या पाप का कोई छेद न हो. केवल पवित्र मन और श्रेष्ठ बुद्धि वाला व्यक्ति ही इस नौका पर सवार होकर मोक्ष और परम शांति को प्राप्त कर सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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