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Xi Jinping Donald Trump Summit: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग गुरुवार को वाशिंगटन डीसी पहुंचे. उनका साफ मकसद था कि हालात को शांत रखना, चीजों को और बिगड़ने न देना और डोनाल्ड ट्रंप को भी ऐसा करने से रोकना. नतीजा यह निकला कि शी-ट्रंप शिखर सम्मेलन का आकलन राजनयिक उपलब्धियों से ज्यादा उस भव्य स्वागत और तमाशे से हो रहा है, जो वहां दिखाया गया.
दोनों देशों के बीच व्यापारिक युद्धविराम दो महीने बढ़ा दिया गया है. AI पर व्यापक सहमति बनी है. बाकी मुद्दों पर बातचीत को आगे बढ़ा दिया गया है. ताइवान और ईरान जैसे संभावित विवादित मुद्दों को इस बार बिगाड़ने नहीं दिया गया.
2015 में माहौल अलग था
यह स्वागत असाधारण रहा. 1962 के बाद पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने हवाई अड्डे पर किसी विदेशी नेता का स्वागत किया. तोपों की सलामी, झंडे, दोनों देशों के राष्ट्रगान और अमेरिकी लड़ाकू विमानों की उड़ान- सब कुछ था. शी के साथ हर जगह ट्रंप और मेलानिया ट्रंप मौजूद रहे. 2015 में शी की अमेरिका यात्रा के दौरान माहौल अलग था. तब वे जलवायु और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अमेरिकी मांगें पूरी करने की मुद्रा में दिखे थे. इस बार माहौल बराबरी का रहा.
गुरुवार की बातचीत में शी ने कहा कि उन्होंने संचार बनाए रखा और चीन-अमेरिका संबंधों के विशाल जहाज को सही दिशा में ले जाने का काम किया. यह मई में बीजिंग में हुए समझौते पर आधारित था, जिसमें रणनीतिक स्थिरता, सहयोग, प्रतिस्पर्धा की सीमाएं और मतभेदों के प्रभावी प्रबंधन की बात कही गई थी. ट्रंप ने भी “वाकई महान दोस्ती” की बात की.
सबसे ज्यादा AI पर चर्चा
अक्टूबर 2025 में बुसान समझौते के तहत अमेरिका ने चीनी आयात पर औसत शुल्क घटाकर 47 प्रतिशत कर दिया, फेंटानिल से जुड़े शुल्कों को 10 प्रतिशत किया और हाई-टेक निर्यात नियंत्रणों को निलंबित कर दिया. चीन ने दुर्लभ पृथ्वी खनिजों पर प्रतिबंध ढीले किए और सोयाबीन जैसी अमेरिकी कृषि वस्तुओं की खरीद फिर से शुरू की. ग्रैहम अधिनियम के खतरे को भी जनवरी 2027 तक युद्धविराम बढ़ाकर फिलहाल टाल दिया गया.
दोनों पक्षों की मुख्य दिलचस्पी रिश्ते को स्थिर रखने में है. ट्रंप इसे कम से कम नवंबर के मध्यावधि चुनाव तक चाहते हैं, जबकि शी अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने और सैन्य नेतृत्व में बदलाव के लिए लंबे समय तक शांति चाहते हैं. सबसे ज्यादा चर्चा एआई पर हुई. शी ने कहा कि एआई को मानव नियंत्रण में रखना होगा. ट्रंप ने पहले ‘सुपर इंटेलिजेंस’ की बात कही थी.
ताइवान इस मुलाकात का असली हाथी था. शी ने साफ कहा कि चीन की स्थिति स्पष्ट है और उम्मीद है कि अमेरिका ‘ताइवान की स्वतंत्रता’ का विरोध करने की अपनी सही स्थिति पर अडिग रहेगा. ईरान पर बहुत कम बात हुई.
भारत के लिए सबक
इस भव्यता ने उस धारणा को कमजोर किया है कि भारत एशिया में चीन का अनिवार्य प्रतिसंतुलन है. ग्रैहम अधिनियम का खतरा असमानता दिखाता है कि भारत को रूसी तेल खरीदने पर सजा दी जा सकती है, जबकि चीन को छोड़ दिया गया. नई दिल्ली के लिए समझदारी यही है कि वह वाशिंगटन के एहसान का इंतजार बंद करे और महत्वपूर्ण खनिजों, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सीमा विवाद के समाधान के जरिए अपना दबाव बनाने की कोशिश करे.
आने वाले महीनों में शेनझेन में एपेक और फिर जी-20 सम्मेलन में दोनों नेताओं की फिर मुलाकात हो सकती है. चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि राष्ट्राध्यक्ष स्तर की कूटनीति चीन-अमेरिका संबंधों की आधारशिला है.
शी चाहते हैं कि दोनों देश ‘साझेदार हों, प्रतिद्वंद्वी नहीं’. ट्रंप कहते हैं कि वे पहले कभी इतने अच्छे नहीं रहे. लेकिन ताइवान, तकनीक, व्यापार, महत्वपूर्ण खनिज, एआई और ईरान जैसे संरचनात्मक मुद्दे और विश्वास की कमी कहीं गई नहीं है. शिखर सम्मेलन की धूमधाम ने दबाव को सिर्फ टाल दिया है, हल नहीं किया.
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-भारत एक्सप्रेस
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