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IITs में छात्र आत्महत्याएं: जातिगत नजरिए से आगे बढ़कर वास्तविक कारणों पर चर्चा जरूरी

IITs में छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे अकादमिक दबाव, मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा और पहचान से जुड़े कई जटिल कारण हो सकते हैं.

IIT
Edited by Rohit Agrawal

IIT Student Suicides: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान हैं. यहां पहुंचने वाले छात्र वर्षों की कड़ी मेहनत, कोचिंग और प्रतिस्पर्धा के बाद प्रवेश पाते हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन परिसरों में छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं. ऐसी दुखद घटनाओं पर चर्चा संवेदनशील होती है. समस्या यह है कि कई बार इन घटनाओं को जल्दबाजी में जातिगत भेदभाव या राजनीतिक-सामाजिक निष्कर्षों से जोड़ दिया जाता है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है.

आत्महत्या कभी एक ही कारण से नहीं होती. इसमें व्यक्तिगत, पारिवारिक, अकादमिक और मनोवैज्ञानिक कारक एक साथ काम करते हैं. IITs के संदर्भ में सबसे प्रमुख और बार-बार सामने आने वाले कारण पढ़ाई का अत्यधिक दबाव, मानसिक तनाव और बढ़ती प्रतिस्पर्धा हैं. इन्हें नजरअंदाज करके केवल एक दृष्टिकोण से घटनाओं को देखने से समस्या का समाधान नहीं निकलता, बल्कि चर्चा भटक जाती है.

अकादमिक दबाव और पहचान का संकट(IIT Student Suicides)

IIT में आने वाले अधिकांश छात्र स्कूल और कोचिंग में टॉपर रहे होते हैं. यहां पहुंचने के बाद relative grading सिस्टम उन्हें अचानक औसत या पीछे महसूस कराता है. एक सर्वेक्षणों और छात्र संगठनों के आंतरिक अध्ययनों में कई छात्र बताते हैं कि “9/10 भी असफलता जैसा लगता है.” लगातार परीक्षाएं, बैकलॉग का डर, असाइनमेंट का बोझ और प्लेसमेंट की अनिश्चितता मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है.

सरकारी आंकड़ों और संसदीय जवाबों से पता चलता है कि 2020-21 से 2024-25 के बीच 23 IITs में 45 छात्र आत्महत्याएं दर्ज हुईं. इनमें परीक्षा और परिणामों के आसपास घटनाओं में वृद्धि देखी गई है. राष्ट्रीय स्तर पर भी NCRB डेटा में परीक्षा में असफलता छात्र आत्महत्याओं का एक महत्वपूर्ण कारण बताई जाती है. कोचिंग संस्कृति से आने वाले छात्र पहले से ही बर्नआउट का शिकार होते हैं; परिसर में यह दबाव और बढ़ जाता है.

प्लेसमेंट का तनाव भी कम नहीं है. कई छात्र IIT डिग्री को उच्च पैकेज वाली नौकरी की गारंटी मानते हैं. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता या अपेक्षाओं से कम परिणाम आने पर भविष्य की चिंता गहरी हो जाती है. सामाजिक अलगाव, सीमित फैकल्टी-छात्र संवाद और मदद मांगने में झिझक (कलंक की भावना) स्थिति को और बिगाड़ते हैं.

जातिगत आंकड़ों से आगे देखना जरूरी

कुछ आंकड़ों में SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों का अनुपात कुल आत्महत्याओं में अपेक्षाकृत अधिक दिखता है (उदाहरण के लिए हाल के पांच वर्षों के आधिकारिक आंकड़ों में लगभग 62 प्रतिशत). यह चिंता का विषय है और संस्थानों को समावेशी वातावरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है. माइक्रो-एग्रेसन या सामाजिक अलगाव के आरोपों की जांच होनी चाहिए जहां सबूत हों.

लेकिन इन आंकड़ों को स्वतः जातिगत उत्पीड़न का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी. आत्महत्याएं जनरल कैटेगरी के छात्रों में भी होती हैं. कई जांचों और संस्थानों के बयानों में अकादमिक दबाव, व्यक्तिगत समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे प्रमुख कारण बताए गए हैं. छात्र सर्वेक्षणों में भी शैक्षणिक तनाव को सबसे बड़ा कारक माना गया है. ड्रॉपआउट आंकड़े भी अकादमिक और अन्य तनाव की ओर इशारा करते हैं, न कि केवल एक सामाजिक श्रेणी की ओर.

किसी भी दुखद घटना को तुरंत राजनीतिक या वैचारिक निष्कर्ष से जोड़ने से वास्तविक समस्या-मानसिक स्वास्थ्य समर्थन की कमी, विषाक्त प्रतिस्पर्धा की संस्कृति और पर्याप्त रोकथाम व्यवस्था-की अनदेखी होती है. हर मामले की स्वतंत्र, संवेदनशील जांच होनी चाहिए, लेकिन सामान्यीकरण से बचना चाहिए.

समाधान की दिशा

समस्या को केवल दोषारोपण से नहीं सुलझाया जा सकता. IITs को संकट प्रबंधन से आगे बढ़कर रोकथाम पर जोर देना होगा:

– मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना, प्रशिक्षित काउंसलर बढ़ाना और कलंक कम करना.
– grading और मूल्यांकन प्रणाली को सहयोगात्मक बनाने की दिशा में सुधार.
– प्लेसमेंट और करियर मार्गदर्शन को अधिक यथार्थवादी बनाना.
– फैकल्टी-छात्र संवाद बढ़ाना और नए छात्रों के लिए बेहतर इंडक्शन तथा सहकर्मी समर्थन.
– कोचिंग संस्कृति के बाद के बर्नआउट को स्वीकार करते हुए समग्र विकास पर ध्यान.

अभिभावकों, समाज और मीडिया की भी भूमिका है. सफलता की परिभाषा को केवल रैंक या पैकेज तक सीमित नहीं रखना चाहिए. मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए.

IITs भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के प्रतीक हैं. वहां पढ़ने वाले युवा देश का भविष्य हैं. उनकी मौतें हमें झकझोरती हैं. इन घटनाओं पर चर्चा हो, लेकिन वह तथ्यों, आंकड़ों और वास्तविक कारणों—पढ़ाई का दबाव, मानसिक तनाव और प्रतिस्पर्धा-पर आधारित हो. जल्दबाजी में किसी एक सामाजिक या राजनीतिक लेंस से देखने से न तो दुख कम होता है और न ही समाधान निकलता है. संवेदनशील, साक्ष्य-आधारित और समाधान-केंद्रित दृष्टिकोण ही सही रास्ता है.

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-भारत एक्सप्रेस

 



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